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ऋग्वेदः विज्ञान और अनुभूति का महामिलन

ऋग्वेदः विज्ञान और अनुभूति का महामिलन

- हृदय नारायण दीक्षित

ऋग्वेद के प्रति पूरे एशिया महाद्वीप में विशेष प्रकार का आदरभाव है। अमेरिकी विद्वान भी वेदों के प्रति उत्सुक हैं। ब्लूमफील्ड ने अथर्ववेद का अनुवाद किया है। जर्मन विद्वान मैक्समुलर ने ऋग्वेद का भाष्य किया है। भारत के लिए वेद वचन ईश्वर की वाणी हैं। ज्ञान के प्रति आदर प्रकट करने का यह भारतीय तरीका अनूठा है। वेदों के श्लोक मंत्र कहे जाते हैं। परंपरा के अनुसार माना जाता है कि ऋषियों ने मंत्र देखे हैं। इसलिए उन्हें मंत्र द्रष्टा कहा गया है। मंत्रों का समूह सूक्त कहा गया है। सूक्त का साधारण अर्थ सु-ऊक्त अर्थात सुंदर कथन है। ऋषि आधुनिक संदर्भ में कवि हैं। वेदों के मंत्र इन्हीं कवियों ऋषियों की रचनाएं हैं।

ऋग्वेद में जिज्ञासा का चरम है। वेदों की विषय वस्तु में कहीं भी ''मानने'' की घोषणा नहीं है। ऋग्वेद के एक भी मंत्र में कोई ऋषि निर्देश नहीं है कि हमारा कथन मानो। वेदों में विचार विविधता है। मुझे वैदिक कवियों का रचनाकौशल व मुक्त विचार तंत्र सम्मोहित करता है। ऋग्वेद के एक मंत्र की स्तुति विशेष ध्यान योग्य है कि ''हे देवो! यहां सभी विचारों का स्वागत है। मेरे पास सभी दिशाओं से सद्विचार आएं।'' मेरे मित्र ऋग्वेद के प्रति हमारे प्यार का प्रेमपूर्ण परिहास करते हैं। मित्रों का आरोप है कि मैं ऋग्वेद की चर्चा जरूरत से ज्यादा करता हॅूं। मित्र मेरी इस लत का परिहास करते रहते हैं। ऐसे ही मित्रों को ऊबते देख मैं ऋग्वेद का अंश सुनाता हूँ। ऋग्वेद में कवि की प्रार्थना है कि ''हमें ऐसे मित्रों से दूर रखो जो प्रश्न व जिज्ञासा में नहीं रमते।'' ऋग्वेद में प्रश्न व जिज्ञासा भी रमण आनंद के क्षेत्र हैं।

ऋग्वेद की कविता में विज्ञान और अनुभूति का महामिलन है। संध्या जैसा प्रशांत विश्रम है। ऊषाकाल जैसा बोधोदय है। जागरण काल की कर्म प्रेरणा है। आनंद का अतिरेक है, अज्ञात की अतिरिक्त जिज्ञासा है। देखे, सुने, समझे अनूभूत यथार्थ के प्रति स्वीकृति है। यहां संसार माया या आभास नहीं है। काल की रेखा पर प्रकृति का प्रत्येक रूप गतिशील है। इसलिए परिवर्तनशील है। अल्पकालिक होने के कारण विद्वानों ने इसे माया या आभास कहा। निस्संदेह दीर्घकाल के सापेक्ष यह माया है लेकिन अपने अल्पकाल में यही यथार्थ सत्य है। वैदिक कविता में समय के सभी आयाम हैं। प्रकृति सदा से है।

कुछेक यूरोपीय विद्वानों ने इस कविता को 'चरवाहों के गीत' कहा था। उनकी मानें तो वैदिक काव्य जानवरों को चराने वाले घुमंतू अशिक्षितों की अभिव्यक्ति है। मुझे उनकी टिप्पणी में रस मिलता है। सामाजिक विकास के प्रारंभिक चरण में चरवाहे नहीं थे। मनुष्यों का पशुओं से परिचय नहीं था। फिर पशु उपयोगी जान पड़े। मनुष्य उनकी सुरक्षा करने लगा। वह घास वनस्पति आदि से भरपूर क्षेत्रों में उन्हें चराने ले जाने लगा। मनुष्य कर्म का यह भाग 'चरवाहा' कहलाया। यह सामाजिक विकास के आदिम चरण से बहुत बाद का चरण है। उस समय पशुओं का उपयोग कृषि कार्य में हो रहा है। इसका अर्थ है कि कृषि कार्य का विकास हो चुका है। पशु माल ढोने के उपयोग में आ रहे हैं। इस कविता में कृषि उपकरणों में भी सुख दुख की अनुभूति है। एक काव्य मंत्र में कहते हैं ''हमारे हल के फाल सुखपूर्वक भूमि जोतें।'' कृषि कार्य को आधार बनाकर रचित इस कविता में देवता भी हल जोतते पाए गए हैं। निर्दोष पशुओं के साहचर्य कृषि कार्य व निर्दोष प्राकृतिक वातावरण में इन चरवाहों के चित्त में गीत उगें हों तो आश्चर्य क्या है? वैदिक कवि हैं।

जीवन में सुख हैं, दुख भी हैं। वैज्ञानिक के पास सुख या दुख का कारण बोध नहीं है। स्टीफेन हाकिंग ब्रहमाण्ड का विवेचन करते रहे हैं। हम उनसे पूछे- दुख का कारण क्या है? वे कहेंगे हम सृष्टि की उत्पत्ति की खोज कर रहे थे? हम आनंद जैसी किसी परमाणु तरंग से परिचित नहीं हैं। लेकिन ऋग्वेद के कवि आनंद के अनेक आयामों से परिचित हैं। सोम एक वनस्पति है। यही सोम वैदिक कवि की उल्लास तरंग में देवता हो गए है। वनस्पति को देवता बनाने के लिए ऋग्वेद के कवियों जैसा भाव बोध चाहिए। वे सोम से स्तुति करते हैं ''जहां मुद, मोद, प्रमोद रहते हैं, हमें वहीं स्थान दें।'' यहां मुद मोद और प्रमोद आनंद के भिन्न तल हैं। दुख बोध के लिए किसी वैज्ञानिक के पास नहीं बुद्ध, नानक या कबीर के पास जाना होगा।

विज्ञान के सत्य सापेक्ष हैं। गति का माप सापेक्ष है। दीर्घ लघु की तुलना में बड़ा है। लघु निरपेक्ष रूप में छोटा नहीं है। वह किसी दीर्घ के सापेक्ष छोटा है। सारे भौतिक सत्य सापेक्ष है, वे अपूर्ण सत्य है। वैज्ञानिक पूर्ण की शोध में तत्पर है। यह प्रशंसनीय है। लेकिन वैदिक कविता में ''पूर्ण'' की अनुभूति है। यहां संपूर्णता को समझने का सुन्दर प्रयास किया गया है। वृहदारण्यक उपनिषद के एक मंत्र काव्य में इस अनुभूति का सुंदर उल्लेख है। कहते हैं, ''वह पूर्ण है-पूर्णमदः। यह पूर्ण है -पूर्णमिदं। उस पूर्ण से ही यह पूर्ण प्रकट हुआ है- पूर्णात पूर्ण मुदच्यते।'' यहां प्रत्यक्ष रूप में दो पूर्ण जान पड़ते हैं। पहला है-वह पूर्ण। दूसरा है-यह पूर्ण। इस संुदर कविता में नाम न देकर यह, वह सर्वनामों से पूर्ण अनुभूति की अभिव्यक्ति की गई है। आश्चर्य चकित करने वाले पूर्ण अस्तित्व के लिए 'वह' शब्द प्रयोग हुआ है। इसी प्रत्यक्ष संसार के लिए 'यह' सर्वनाम प्रयोग किया गया है। ये दो नहीं है। दो पूर्ण हो ही नहीं सकते। इसलिए स्पष्ट करते हैं कि यह पूर्ण उस पूर्ण का विस्तार है। पूणर्, पूर्ण है, इसलिए पूर्ण में पूर्ण घटाने पर भी पूर्ण ही बचता है।

पूर्ण की सिद्धि फिलहाल विज्ञान के पास नहीं है। इसका मर्म समझने के लिए हमें याज्ञवल्क्य या शंकराचार्य के ''अद्वैत गाॅंव'' जाना होगा। 'अद्वैत गांव' हमारी अपनी प्रीति की कल्पना है। गांव हमेशा दिक्काल में होते हैं। यहां तक विज्ञान की सहयात्रा है। विज्ञान में तर्क की सार्थकता है लेकिन आत्मबोध की प्राप्ति तर्क से नहीं होती। कठोपनिषद् की कथा में यम ने नचिकेता से कहा है कि ज्ञान तर्क से नहीं मिलता-नैषा तर्केण मतिरापयेना। तर्क का अपना परिवार है। तर्क का प्रतिवाद प्रतितर्क है। तर्क के प्रति जागरूकता सतर्क है। सतर्कता में अगंभीरता कुतर्क है। तर्क का सबसे बड़ा उपयोग यह जान लेना है कि तर्क से मूल तत्व नहीं मिलता। हम विज्ञान के विद्यार्थी प्रकृति में अंतर्विरोध देखते हैं। वैदिक कवि प्रकृति में अंतर्संगीत सुनते हैं। प्रकृति के घटकों में भी अंतर्विरोध जान पड़ते हैं लेकिन वैदिक कवियों की अनुभूति में प्रकृति लयबद्ध है। उन्होंने इस लयबद्धता को 'ऋत' कहा है। ऋत की गति में अंर्तध्वनि भी है। इस अंर्तध्वनि को कवियों ने सुना था। यह गीत रूप में ओउम है। 'ओउम् परम ध्वनि है। शब्द नहीं है। इसलिए ओउम् का अर्थ नहीं है। यह अस्तित्व का संगीत है।

मैं काव्य के मर्म से परिचित नहीं हूँ। मैंने बहुत प्रयास किए हैं। लेकिन कविता नहीं लिख पाया। कवि सम्मेलनों में जाता हूँ। मुझे वैदिक कविता वाला आस्वाद नहीं मिलता। इसका कारण मेरी अपनी बुद्धि है। बुद्धि और कविता प्रायः दूर रहते हैं। कविता हृदय की पुकार है। सामान्य से सुंदरतम हो जाने की संभावना है।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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