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आपकी बात

  • चुनावी बिरयानी के बकरे

    चुनावी हांडी बिहार में चढ़ गई है. 'सरकार' असल में उम्दा बिरयानी होती है जो नेता रसोइया अपने पूंजीपति आका के लिए बनाता है. बिरयानी को पकाने में जद्दोजहद है - चावल, मसाले, तेल आदि जुटाना और वह भी चुनाव में खासा पहले - बिरयानी को मद्धम आंच पर लम्बे समय तक पकाना उत्तम है. सबसे ज़रूरी है बढ़िया नस्ल के...

  • महात्मा से मुलायम तक प्रतीकों की राजनीति के सियासी मोहरे

    -अजय कुमार,लखनऊ राजनीति में प्रतीकों का बेहद महत्व होता है। मौसम चुनावी हो तो फिर प्रतीकों की राजनीति 'सोने पर सुहागे' जैसी हो जाती है। वोट बैंक की सियासत के चलते परलोक गमन कर चुके गए नेताओं तक को सियासी 'धरती' पर उतार दिया जाता है। प्रतीकों की राजनीति में सबसे बड़ा नाम महात्मा गांधी का है, कां...

  • पराली का धुआं

    -सिद्धार्थ शंकर भारत में तेजी से बढ़ते प्रदूषण को लेकर फिर से जो रिपोर्ट आ रही हैं, उनसे साफ है कि अगर हम समय रहते नहीं चेते तो आने वाले दिनों में हालात और भयावह होंगे। देश के कई राज्यों में फिर से पराली जलाने की खबरें आने लगी हैं। दिल्ली की हवा तो सबसे ज्यादा खराब हो चुकी है। एक अध्ययन में यह ब...

  • पाकिस्तान में अचानक बढ़ी नकदी , छपे ज़्यादा नोट

    डॉ. प्रभात ओझाई-कॉमर्स और डिजिटल लेन-देन के बढ़ते चलन के बीच पाकिस्तान में नोटों की छपाई का बेतहाशा बढ़ना वहां के आर्थिक जगत में चिंता का कारण है। पूरी दुनिया को पता है कि नोट छापने के तय मानकों के उल्लंघन का क्या मतलब होता है। मानकों के पालन के साथ भी नोट औसत से अधिक छपें तो कम से कम देश में मुद्रा ...

  • बागियों के भरोसे चुनावी शिकार पर 'चिराग'


    मुरली मनोहर श्रीवास्तवबिहार विधानसभा चुनाव में जहां कलतक एनडीए और महागठबंधन के बीच वाकयुद्ध और राजनीतिक लड़ाई जारी थी। आज एनडीए और महागठबंधन अंदरुनी कलह से जूझ रहे हैं। महागठबंधन में कलतक कांग्रेस, राजद, रालोसपा, वीआईपी एक साथ थे, सीटों के बंटवारे को लेकर विवाद होने के बाद महागठबंधन में राजद, क...

  • तय करें कपल चैलेंज जरूरी है या लाईफ

    सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म को किस लिए और किस तरह उपयोग करना है। सिर्फ लाईक ही मिले यह जरूरीनहीं। सबसे जरूरी हैं स्वयं के मस्तिष्क का उपयोग करना। हम किस तरह किसी की लाईफ में कितना इंटरफेअर करें यह भी तय करना आवश्यक है। सिर्फ मज़ाक-मस्ती में किसी का घर-परिवार बिखर सकता है वरन् इसके गंभीर परिणाम भी...

  • मित्र बनता मलेशिया, जाकिर नाइक को भारत भेजेगा ?


    -आर.के. सिन्हा मोहातिर मोहम्मद के मलेशिया के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद ऐसा लगने लगा है कि मलेशिया अब सीधी पटरी पर आ गया है। या यूँ कहें कि पहले से ज्यादा व्यावहारिक हो गया है। उसने खुलकर भारत विरोध अब लगभग बंद कर दिया है। मलेशिया के नए प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन ज्यादा समझदार लगते हैं। उन्हो...

  • आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति


    -रमेश सर्राफ धमोरा विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर साल लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं। जिनमें से 21 फीसदी आत्महत्याएं भारत में होती है। हमारे देश में शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता होगा जब किसी न किसी इलाके से गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, कर्ज जैसी तमाम आर्थिक तथा अ...

  • मोदी सरकार का नया संकट,कोरोना काल में बढ़ी बेरोजगारी


    -अजय कुमार अजब इतिफाक है। एक तरफ केन्द्र की मोदी सरकार निजीकरण की ओर बढ़ रही है तो दूसरी ओर उस पर इस बात का दबाव है कि वह युवाओं के लिए अधिक से अधिक सरकारी नौकरियों की व्यवस्था करे। देश का यह दुर्भाग्य है कि यहां का करीब 75 प्रतिशत पढ़ा-लिखा युवा अपने पैरों पर खड़े होने का मतलब येनकेन प्रकारे...

  • मंदारी और सपेरे' का खेल है 'कृषि सुधार बिल'

    केंद्र सरकार की तरफ़ से कृषि सुधार पर लाया गया बिल सत्ता और विपक्ष की राजनीति में 'मंदारी और सपेरे' का खेल बन गया है। सरकार ने बीन बजाई और उसकी झोली से एक उम्दा 'किसानहित' बिल निकल गया। लेकिन यह खेल दूसरे सियासी मदारियों को नहीँ पच रहा है। कृषि सुधार के तीन विधेयकों पर सड़क से लेकर संसद तक की...

  • विपक्ष अर्थहीन....! क्या तानाशाही की ओर बढ़ रही है सरकार.....?

    यह सवाल लेखक का नही, बल्कि देश का आम जागरूक नागरिक केन्द्र सरकार की मौजूदा भूमिका को लेकर सामने रख रहा है, हमारे पूर्वज कवि चाहे शासकों को यह मंत्र दे गए हो कि- 'निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय' किंतु शायद आज की राजनीति में यह मंत्र निरर्थक सिद्ध हो गया है, आज सरकार संसद में वही सब करने को आतुर...

  • किसानों से तो पूछ लेते ,उन्हें क्या चाहिए ?

    हाल ही में पारित कृषि विधेयकों को लेकर किसानों और व्यापारियों की आशंकाएं बलवती हो गई है। किसानों को आशंका है कि इससे न्यूनतम मूल्य समर्थन प्रणाली समाप्त हो जाएगी।वही किसान यदि पंजीकृत कृषि उत्पाद बाजार समिति-मंडियों के बाहर अपनी उपज बेचेंगे तो मंडियां समाप्त हो जाएंगी।साथ ही ई-नाम जैसे सरकारी ई...

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