Top

बाल कथा: नमकीन खीर

बाल कथा: नमकीन खीर

एक सेठ थे। व्यापार अच्छा चलता था। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। बड़ी-सी हवेली थी। नौकर-चाकर भी थे पर सेठ क्रोधी स्वभाव के थे। जरा सी भी गलती उनसे बरदाश्त नहीं होती थी। नौकर उससे थर-थर कांपते थे। सेठानी का स्वभाव बिल्कुल इसके विपरीत था। वह दयालु और हंसमुख थी। सभी की मदद करने की कोशिश करती थी।

एक दिन सेठ खाना खाने बैठा। नौकर खाना परोसकर लाया तो असली घी की सुगंध में पूरा कमरा महक उठा। कई तरह की सब्जियां, पूरी, कचौरी और खीर थी। सेठ ने पूरी का ग्रास तोड़कर सब्जी से खाया तो मुंह का जायका बिगड़ गया। सब्जी मीठी थी। फिर उसने चम्मच भरकर खीर चखी तो वह नमकीन थी। अब तो गुस्से से उसका पारा सातवें आसमान पर था। सेठ का चेहरा देख, खाना लाने वाले नौकर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

सेठ चीखकर बोला, 'यह क्या मजाक है। रसोइया कहां है? यह खाना कौन खाएगा?'

सेठ की आवाज सुन सेठानी भी हाथ का काम छोड़कर दौड़ी आई। सेठ ने गुस्से से आंखें लाल करके सेठानी से कहा, 'रसोइया कहां है? उसे बुलाओ मेरे पास।'

रसोइया घबराया हुआ आया। सेठ बोला, 'लगता है, अब काम से तुम्हारा जी भर गया है। तभी तू सब्जी में चीनी और खीर में नमक डालने लगा है।'

सेठानी बोली, 'मगर ऐसा पहले तो कभी नहीं किया इसने। जरूर कुछ गड़बड़ है।'

'गड़बड़ कुछ नहीं। नौकर निकम्मे और कामचोर हो गए हैं। तुमने इन्हें सिर चढ़ा रखा है। आज से रसोइये की छुट्टी।सेठ ने गुस्से में कहा।

सेठानी ने देखा, रसोइया गुमसुम खड़ा था। आंखें बोझिल थीं। चेहरे पर थकान थी। वह ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा था। सेठानी ने उससे पूछा, 'क्यों भाई, क्या तुम आज रात सोए नहीं? बहुत थके से लग रहे हो। क्या बात है?'

सेठानी की ममता भरी बातें सुनकर रसोइया चुप नहीं रह सका। फूट-फूटकर रोने लगा। सेठानी ने उसे दिलासा दिया। आंखें पोंछकर रसोइया बोला, 'मालकिन, मेरी पत्नी गंभीर रूप से बीमार है। उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। इसीलिए मैं कई रातों से सो नहीं सका। घर का कामकाज भी मुझे ही संभालना पड़ता है। क्षमा करना, गलती से ऐसा हो गया।'

सेठानी ने सेठ की तरफ देखा। अब उसका भी गुस्सा कम हो चुका था। सेठानी ने उसी वक्त रसोइए को छुट्टी दे दी। साथ में रूपए भी दिए जिससे वह अपनी पत्नी का ठीक से इलाज करा सके।

जब वह चला गया, तो सेठानी ने नौकरों को आदेश दिया, 'आज के सारे खाने को पशुशाला में डलवा दो।'

यह सुनकर सेठ ने कहा, 'खाने को पशुओं को खिलाने की क्या जरूरत है? नौकर खा लेंगे।'

इस पर सेठानी बोली, 'स्वामी, नहीं ऐसा मत करो। रसोइए से यह गलती हुई है। उसने जान-बूझकर ऐसा नहीं किया है। अब जो भी नौकर-चाकर मीठी सब्जी और नमकीन खीर खाएंगे, रसोइए का मजाक उड़ाएंगे। मैं नहीं चाहती, एक परेशान आदमी का बेकार ही मजाक उड़ाया जाए।'

सेठानी की बात सुनकर सेठ भी चुप रह गया। वह सारा खाना पशुओं को डलवा दिया गया। उस दिन से सेठ ने अकारण गुस्सा करना छोड़ दिया।

- नरेन्द्र देवांगन

Share it