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फूल और पौधों की देखभाल

फूल और पौधों की देखभाल

बिन्नी तितली बहुत उदास थी। मिटठू तोता फुदक कर उसके पास आया और बोला, 'क्या हुआ बिन्नी?'

पर बिन्नी तितली ने तो जैसे सुना ही नहीं, वह चुपचाप कुछ सोचती रही। बिन्नी तितली तो ऐसी कभी नहीं थी, वह तो बहुत खुशमिजाज थी। इधर-उधर बगीचों आदि में घूमती-फिरती, सभी को मीठी बातें सुनाती रहती लेकिन अचानक उसे यह हुआ क्या है? मिटठू तोते ने सोचा। उसने बिन्नी तितली को हंसाने की कोशिश की। तरह-तरह से सीटियां बजाईं, पंख नचाए पर वह न हंसी।

तभी वहां से टिल्लू मुर्गा और गिल्लू हिरन गुजरे। दोनों बहुत खुश थे। टिल्लू मुर्गे के हाथ में फूलों का एक बहुत बड़ा गुच्छा भी था। मिटठू तोते ने उन्हें रोक कर पूछा, 'आखिर बिन्नी तितली को हुआ क्या है?'

'हमें तो नहीं पता। हम तो सुबह से फूल चुनने में लगे हुए हैं।' टिन्नू हिरन बोला।

'अरे देखो बिन्नी, हमने इतने ताजे और सुंदर फूल इकटठे किए हैं कि तुम भी देखती रह जाओगी।' टिल्लू मुर्गा शान से कलगी तान कर बोला।

'वाह, क्या खुशबू है।' मिटठू तोता लंबी सांस ले कर चहका, 'पर ये हैं किसलिए?'

'देबू बंदर को जन्मदिन का उपहार देंगे न।' तपाक से टिन्नू हिरन बोला।

फूलों का खूबसूरत गुच्छा देख कर बिन्नी तितली की आंखों में आंसू भर आए और वह फूटफूट कर रोने लगी। सबकी आंखें खुली रह गईं कि आखिर बिन्नी के रोने का क्या कारण हो सकता है।

'क्या तुम्हें फूल पसंद नहीं आए?' मिटठू तोते ने पूछा।

'नहीं, यह बात नहीं है,' बिन्नी तितली बोली, 'आज सुबह से मैं इधर-उधर फूलों की तलाश में भटकती रही। जहां जाती, वहां फूल बिखरे हुए पाती, किसी ने उन्हें बेरहमी से तोड़ा या कुचला होता। मेरे सारे भाई-बहन भी पराग की तलाश में परेशान घूम रहे थे। आज पता चला, हमारे फूल इतने कम क्यों हैं।' बिन्नी तितली ने दुखी स्वर में जवाब दिया।

बिन्नी की बात सुन गिन्नू हिरन और टिल्लू मुर्गा बहुत शर्मिंदा हुए। उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा। जरा से मजे के लिए उन्होंने कितनी सारी तितलियों और कोमल फूल-पौधों को चोट पहुंचाई। वे देबू को उपहार में कुछ और भी तो दे सकते थे।

अगले दिन सुबह तड़के टिल्लू मुर्गे ने गिल्लू हिरन को सूरज उगने से पहले उठा दिया। दोनों मित्र बगीचे में नन्हे पौधों की देखभाल में जुट गए। जल्दी-जल्दी वे नदी से पानी भर कर लाए और सब पौधों को अच्छी तरह सींचा।

हरे-भरे पौधे लहरा उठे। टिन्नू मुर्गे ने तीन बार जोरदार बांग लगाई क्योंकि सूरज जो निकल आया था। नन्ही कलियां मुस्कुराती खिल उठीं।

'मिटठू.....मिटठू.....' करता मिटठू तोता वहां आ बैठा।

'अरे वाह, कितने सारे फूल खिले हैं आज तो। कितनी ताजा खुशबू फैली है.... मजा आ गया।' लंबी सांस लेकर वह चहका।

अचानक ढेर सारी तितलियां झिलमिलाती हुई आईं और जैसे फूलों के साथ आंख-मिचौनी खेलने लगीं। इतना सुंदर नजारा देख कर टिल्लू, गिन्नू और मिटठू की खुशी का ठिकाना न रहा।

- नरेंद्र देवांगन

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