Top

बाल कथा: ऐसे सुलझी दिक्कत

बाल कथा: ऐसे सुलझी दिक्कत

काफी पहले की बात है। इंडोनेशिया में एक बालक का एक स्कूल में दाखिला कराया गया। नया माहौल था और बालक नादान था, इसलिए वह सहमा सा रहता था। कुछ बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे। कोई भूल हो जाए तो उस पर हंसते थे।

बालक अपने आप को संभालने के काफी यत्न करता था। अक्सर सहपाठियों की टीका-टिप्पणियों पर उसे रूलाई आ जाती थी। एक बार उसका मन पढ़ाई से उचट गया। उस दिन जब वह घर लौटा तो बस्ता पटककर माता और पिता से कहा, 'कल से मैं स्कूल नहीं जाऊंगा।'

'क्यों बेटा? ऐसी क्या बात हो गयी कि तुम स्कूल नहीं जाओगे?' बालक से विनम्र और सहृदय पिता ने पूछा।

बालक ने कारण बताने के बजाय कहा, 'बस यूं ही, मन नहीं लगता स्कूल में।'

पिता ने पुन: प्रश्न किया, ऐसी क्या वजह है जो स्कूल में मन नहीं लगता?

उस समय बालक पिता की गोद में बैठा था और पिता उसके बालों में हाथ फेर रहे थे। बालक कुछ बोलने के बजाय रोने लगा। पिता बड़े बुद्धिमान थे। उन्होंने उस वक्त और पूछताछ करना ठीक नहीं समझा। उसे पिता ने प्यार से चुप कराया।

संध्या समय बालक ने बातों-बातों में बताया कि साथी रोज उसका मजाक उड़ाते हैं और उस पर कटाक्ष करते हुए हंसते हैं। इस पर परिवार वालों ने उसे समझाया कि ऐसा अक्सर होता ही है। तुम्हें उनकी परवाह न करते हुए गंभीरतापूर्वक पठन-पाठन करना चाहिए। थोड़े दिनों में वह लोग तुम्हारा मजाक उड़ाना बंद कर देंगे और वह ऐसा न भी करें तो तुम्हें क्या। तुम अपने काम में मन लगाओ।

बालक को परिवार वालों ने तरह-तरह से समझाया किंतु वह स्कूल जाने को राजी न हुआ। अब परिवार वाले बिगडऩे लगे। पिता जी ने उन्हें चुप कराया वे जानते थे कि बालक को डांटने फटकारने से मामला और बिगड़ता है। किसी से कोई काम जबरदस्ती कराया जाए तो उसका परिणाम कभी अच्छा नहीं होता। वे अपने साथ बालक को घुमाने गांव से बाहर ले गये।

एक नाला बह रहा था। उसमें पानी बहने की गति बड़ी धीमी थी। पिता ने नाले में एक मोटा सा पत्थर फेंका। बालक देख रहा था। पानी में पत्थर गिरते ही पानी का सामान्य प्रवाह कुछ क्षण के लिए अवरूद्ध हुआ और फिर कुछ ही क्षणों में सामान्य हो गया।

पिता ने बालक से पूछा, 'तुमने क्या देखा?' बालक उत्तर देने के लिए सोच रहा था कि पिता ने कुछ क्षण बाद कहा, 'तुमने देखा कि पत्थर से पानी का प्रवाह अवरूद्ध हो गया परंतु कुछ ही सेकेंडों में वह फिर से पूर्ववत हो गया। है न सही बात?'

बालक बोला, 'जी हां। ऐसा ही हुआ था।'

पिता बोले, 'ऐसा ही हमारे साथ होता है। हमारे रास्ते में भी रूकावटें आती हैं मगर उन रूकावटों पर हम विजय पाने का यथासंभव प्रयत्न करते हैं। अगर बाधाओं से घबरा कर हम हाथ-पर हाथ रखकर घर बैठ जाएं तो हम कभी तरक्की नहीं कर पाएंगे।'

अगली सुबह बालक समय से स्कूल के लिए तैयार हो गया। घर वाले आश्चयचकित थे। बालक ने न सिर्फ अच्छी पढ़ाई की बल्कि बड़ा होकर स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व भी किया। देश आजाद हुआ तो वह देश का राष्ट्रपति भी बना। इंडोनेशिया का यह बालक था-सुकर्णो जो बाद में इंडोनेशिया का राष्ट्रपति बना।।

- ए.पी. भारती

Share it
Top