Top

जीत किसकी केजरीवाल या शातिराना राजनैतिक चालों की

जीत किसकी केजरीवाल या शातिराना राजनैतिक चालों की

- राज सक्सेना

विधान सभा के ताजा चुनावों में दिल्ली की जनता ने सिद्ध कर दिया कि दिल्ली की राजधानी में प्रजातंत्र नहीं भीड़ तन्त्र है। दिल्ली की जनसंख्या में अधिकतर बाहर से आये हुए लोग हैं और उन्हें दिल्ली से दिली लगाव नहीं है। उन्हें मुफ्त की बिजली और मुफ्त के पानी की धार में बहना ही था वे बह गये और उन्होंने अपना वोट केवल जीतने और सिर्फ जीतने के लिए हर हथकंडे को अपना रहे राजनीतिक शातिरों के हाथ अपना भविष्य गिरवीं रखते हुए दे दिया। यह बात किसी हद तक सही हो सकती है, किन्तु दिल्ली के मूल निवासियों और अपने आप को देश का सबसे पढ़ा लिखा और स्वयं को औसत दर्जे से अधिक अक्लमंद कहने और समझने वाले पढ़े लिखे वर्ग को क्या हुआ? यह समझ नहीं आया। शायद इन लोगों की आदत 'रिडक्शन सेल' से माल खरीदने और उसे पहन कर 'फ्रेश माल शो' करने की आदत पड़ चुकी है। शायद यह अक्लमंद तबका कार के साथ मिलने वाली 'दस रूपये की झाड़ू' भी न छोड़ने की मानसिकता से ग्रसित, तथाकथित 'हाई क्लास' यह भूल गया कि दुनिया में कोई भी चीज मुफ्त नहीं मिलती सिर्फ आंकड़ों का फेर है या जिसके साथ यह वस्तु, जो मुफ्त दी जा रही है उसकी कई गुनी कीमत या तो छिपे तौर पर पहले ही ली जा चुकी है या फिर चोरी छुपे ले ली जाएगी। खैर जो हुआ सो हुआ अब दिल्ली फिर पांच साल के लिए कुछ 'ईमानदार, देशभक्त और धार्मिक' करामातियों के हाथों जो इस जीत से राष्ट्रीय परिदृश्य पर एक बार फिर स्थापित होने की कोशिश करेंगे, के हाथों गिरवीं हो चुकी है। रोज संविधान को ठेंगा दिखा रहे लोगों को दिल्ली की जनता ने एक बार फिर संविधान की चौकीदारी सौंप दी है और खुशियाँ मना रही है। यह विडम्बना नहीं तो क्या है?

दिल्ली की जीत का सेहरा वस्तुतः केजरीवाल के सिर पर नहीं शातिर 'इलेक्शन एक्सपर्ट' प्रशांत किशोर के सिर पर सजना चाहिए जिसने पर्दे के पीछे से 'केजरीवाल को केंद्र में रख कर' पूरे इलेक्शन की पटकथा लिखी, उसमें हर पात्र की भावभंगिमा सहित डायलॉग लिखे गये और एक एक पल पूरी तन्मयता और गंभीरता से पूरे नाटक का निर्देशन किया। मजाल क्या कि एक भी डायलौग या ट्वीट का एक भी अक्षर बिना प्रशांत की स्कूटनी के 'पब्लिक' हो जाय। कुल मिला कर सारांश यह कि टक्कर प्रशांत किशोर बनाम भाजपा थी और इलेक्शन का मैदान था दिल्ली जिसे भारत का दिल भी कहा जाता है। यहाँ टक्कर थी देश तोड़ने वाली ताकतों से राष्ट्रवाद की, जीतने के लिए किसी भी हद तक चले जाने वालों की टोली की और एक स्वस्थ और सार्थक सोच के साथ युद्ध के मैदान में उतरने वालों की। एक पक्ष जीतने के लिए लड़ रहा था इसलिए हर हथकंडा स्तेमाल कर रहा था और दूसरा पक्ष देश की रक्षा करने के लिए सत्ता चाह रहा था। जैसा कि परम्परा है कि इतिहास अपने को दोहराता है, दिल्ली में भी इतिहास ने स्वयं को दोहरा दिया और कुछ मुफ्तखोरी की आदत से ग्रसित 'लिबरल' लोगों ने इसमें सहायता करदी।

दिल्ली की लड़ाई जीतने के लिए केजरीवाल ने 2015 में जीतने के पहले दिन से ही कोशिश शुरू करदी थी। अंतिम अधिकार और भले कामों का क्रेडिट लेने के लिए केजरीवाल ने परम्परा से अलग हट कर और अपनी सरकारी नौकरी में कामचोरी की आदत से ग्रसित मानसिकता के चलते और चालाकी से चालाक चालें चलने के लिए स्वयं को मुख्य मंत्री तो रक्खा किन्तु कोई विभाग नहीं रक्खा। मनीष सिसौदिया को उपमुख्यमंत्री बना कर सारा काम उन्हें सौंप दिया। जबकि दिल्ली जैसे छोटे और कम अधिकार प्राप्त राज्य में उपमुख्यमंत्री की आवश्यकता ही नहीं थी। आदत के अनुसार वे और उपमुख्यमंत्री सहित उनके नवरत्न पहले ही दिन से मोदी, भाजपा और कांग्रेस को अपशब्दों की सीमा लांघ कर कोसने लगे थे। इससे उनकी छवि समाज में खराब होने लगी। कई बार स्थिति असहज हुयी और उन्हें और उनके कई साथियों को माफ़ी तक मांगनी पड़ी। कुल मिला कर सब कुछ अच्छा नहीं रहा। केंद्र सरकार ने भी आक्रामकता दिखाई और उसके परिणाम भी कोई बहुत अच्छे नहीं रहे। तब तक अधिकारों का प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय में जा चुका था और केजरीवाल सरकार के पैर डगमगाने लगे थे इसी समय 2014 में मोदी के इलेक्शन की कमान संभाल चुके प्रशांत किशोर ने अपना हाथ आगे बढाया और दोनों की महत्वाकांक्षाओं ने आगे बढ़ कर गठबंधन कर लिया। रणनीति बनने लगी, निर्वाचन-नाटक की पटकथा लिखी जाने लगी। इसी बीच सुप्रीमकोर्ट का निर्णय आया और उसने दोनों सरकारों के अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या करते हुए निर्णय दे दिया गया। अब कोसने के लिए कुछ रह ही नहीं गया था इसलिए 'अच्छे बीते पांच साल- लगे रहो केजरीवाल' नारे को जन्म दिया गया और पूरी दिल्ली को इससे पाट दिया गया। अपने अधिकार क्षेत्र के स्कूलों की रंगाई पुताई करा दी गयी कुछ कमरों और एकाधेक स्कूल का नवनिर्माण भी करा दिया गया जिसमें कई बार भृष्टाचार के आरोप भी लगे। मुहल्ला क्लीनिक का लाजबाव आइडिया पहले से चल ही रहा था और इसके माध्यम से मौहल्ला कमेटियों का गठन कर हर मुहल्ले में पैठ बनाई जा चुकी थी। जिसके माध्यम से मुहल्ला स्तर पर झूठ का जाल फैलाने की पूरी तैयारी कर ली गयी थी। दिल्ली सरकार के साधनविहीन अस्पतालों में पांच लाख तक के इलाज की योजना जो वास्तव में पूरी तरह फेल थी को खूब प्रचारित किया गया। स्कूलों में औसत दर्जे के बच्चों का प्रवेश बंद कर औसत दर्जे से ऊपर के बच्चों को प्रवेश दिया जाने लगा, उनके लिए स्कूलों में अच्छी पढाई की व्यवस्था के बजाय उन्हें फ्री कोचिंग की व्यवस्था करदी गयी। फलस्वरूप बच्चे अच्छा रिजल्ट लाने लगे और माँ बाप फ्री कोचिंग का उपहार पाकर गदगद होने लगे। इसको इस तरह प्रसारित किया गया कि विदेश जाकर सिसौदिया कोई जादू की छड़ी ले आए हैं और उन्होंने देश के सरकारी स्कूलों की परम्परा से हट कर दिल्ली के सरकारी स्कूलों में एक क्रान्ति पैदा कर दी है। पैट्रोल डीजल पर वैट बढ़ा कर कुछ पैसा आगामी छिपी योजनाओं जिनका जिक्र हम बाद में करेंगे इकट्ठा करना शुरू कर दिया गया। प्रदूषण के नाम पर प्रदूषण बोर्ड की सख्ती से बंद हुए जेनेरेटरों को बंद करने का सेहरा अपने सर लिया गया। केंद्र सरकार द्वारा बनाई गयी सीमावर्ती सड़कों से दिल्ली के बाहर ही बाहर दिल्ली क्रास करने वाले ट्रकों और भारी वाहनों के चले जाने से रोज लगने वाले जाम में कमी से कम हुए प्रदूषण को अपनी देन प्रचारित कर उसका क्रेडिट अपने सिर ले लिया। अपने प्रभाव क्षेत्र की सडकों और नालियों की मरम्मत और नवनिर्माण कराकर उसे खूब प्रचारित किया गया। कुल मिलकर पब्लिसिटी पर बेशुमार खर्चा किया गया और फर्जी विकास की एक गंगा बहने का वातावरण दिल्ली में बना दिया गया। खूब पब्लिसिटी की गयी और ऐसा माहौल बना दिया गया जैसे दिल्ली को केजरीवाल ने पैरिस बना दिया है।

इसके बाद जीत पक्की करने के लिए आम जनता की कमजोर नस पकड़ते हुए जीएसटी के शेयर के रूप में प्राप्त अधिक राशि और वैट से प्राप्त संचित कोष का प्रयोग करते हुए दिल्लीवासियों को बीस हजार लीटर पानी और दो सौ यूनिट मुफ्त बिजली के तौह्फे थमा दिए गये। जिसे रिडक्शन सेल पर खरीदारी करने की आदी जनता ने सिर माथे लिया और पूरी दिल्ली में केजरीवाल ही केजरीवाल नजर आने लगे।

अंत में प्रशांत किशोर और केजरीवाल एंड पार्टी ने भाजपा की मनपसन्द क्रीज (हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद की क्रीज) अपने मैदान पर, अपने हितसाधन के लिए, अपने अनुसार, अपने क्रीज मेकरों से शाहीन बाग़ में तैयार करा कर उस पर खेलने का आकर्षक आफर दे दिया। भाजपा केजरीवाल की चाल नहीं समझ पाई और उसे अपने लिए स्वर्ण अवसर समझ कर उसपर पूरी जी जान और शिद्दत से उतर गयी और उसपर धर्म और राष्ट्रवाद की धुआंधार बैटिंग केजरीवाल के विकास के मुद्दे की पोलें खोलने की बैटिंग के स्थान पर करने लगी। शाहीन बाग़ की पूरी परिकल्पना और पटकथा केजरीवाल की देखरेख में बनने के बावजूद केजरीवाल ने शातिराना चाल के रूप में शाहीन बाग़ से दूरी बनाए रखी और उस पर कुछ भी बोलने से बचते रहे। परिणामस्वरूप भाजपा अमित शाह के लाख प्रयासों के बावजूद शाहीन बाग़ की पिच पर ही खेलती रही और नकारात्मक खेल के रूप में अपनी बयानबाजियों के छक्के लगाने के प्रयासों में आउट होती चली गयी। प्रशांत किशोर अपनी शातिर चाल से भाजपा को शाहीन बाग़ में ही उलझाए रहे उसे किसी और ओर देखने ही नहीं दिया।

महान संत तुलसीदास जी ने रामायण में लिखा है 'हानि, लाभ, जीवन, मरण, जस, अपजस विधि हाथ' उसे चरितार्थ करते हुए रही सही कसर भाजपा के 'कांग्रेस मुक्त भारत' से पीड़ित हाशिये पर जा चुकी, दिल्ली कांग्रेस ने पूरी करदी। वह कहीं पर भी लड़ने की स्थिति में नहीं रही और मात्र साढ़े चार प्रतिशत वोट पाकर सत्तर में से सड़सठ प्रत्याशियों की जमानत तक गंवा बैठी। जिससे कांग्रेस को जाने वाला परम्परागत वोट आप की ओर शिफ्ट हो गया और आप की सारी चालें सफलता के आयाम को छूने लगीं। इस पूरे प्रकरण में एक उल्लेखनीय बात यह भी थी कि अपनी उग्र और नकारात्मक राजनीति के लिए प्रसिद्ध केजरीवाल डेढ़ साल से प्रशांत किशोर की पटकथा और उनके निर्देशों के अनुसार पूरी तरह 'शांत और बेचारे' बने रहे जिससे बिना मांगे जनता की सहानुभूति उन्हें अपने आप मिलती चली गयी।

संतोष की बात यह है कि इतनी विपरीत परिस्थितियों और शातिर चालों के बावजूद भाजपा के वोट बैंक में पांच प्रतिशत की वृद्धि हुयी है और इस निर्वाचन के चलते देश के सामने बामपंथियो और कांग्रेसियों का नकाब पूरी तरह उतर गया है। देश ने देखा कि भले ही शातिराना चालों के रूप में ही सही मुस्लिम मंचों पर भारत माता की जय और वंदेमातरम् के खूब नारे लगे। जगह जगह जनमनगण गाया गया, अपने आप को भाजपा से अधिक देशभक्त सिद्ध करने की कोशिशें की गयीं और सबसे बड़ी बात 'पन्द्रह मिनिट को पुलिस हटा लेने' की बात कहने वाले अकबरुद्दीन ओबैसी जो असद्दुदीन ओबैसी भाई हैं के हाथों मन्दिर निर्माण के लिए तेलंगाना के मुख्यमंत्री को दस करोड़ रूपये की धनराशि अर्पण कराई गयी। सच है 'मोदी है तो मुमकिन है'।

सम्पर्क- हनुमान मन्दिर, पीलीभीत रोड, खटीमा-262308(उत्तराखंड) चल सम्पर्क- 9410718777

Share it