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ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे छोड़कर भारत बना विश्व की 5वीं अर्थव्यवस्था वाला देश ?

ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे छोड़कर भारत बना विश्व की 5वीं अर्थव्यवस्था वाला देश ?


-सनत जैन


शोध रिपोर्ट पर विश्वसनीयता का संकट

अमेरिका के एक शोध संस्थान वर्ल्ड पापुलेशन रिव्यू ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें दावा किया गया है, कि भारत की इकोनामी 2.94 ट्रिलियन डॉलर की हो गई है। भारत ने ब्रिटेन और फ्रांस को अर्थव्यवस्था के मामले में पीछे छोड़ दिया है यह रिपोर्ट ऐसे समय पर आई है। जब सारी रेटिंग एजेंसी भारत की जीडीपी की रेटिंग को घटा रही हैं।

भारतीय वित्तीय संस्थान भी भारतीय अर्थव्यवस्था और जीडीपी की ग्रोथ के अनुमान को लगातार घटते जा रहे हैं। उसके बाद अमेरिका का शोध संस्थान जो जनसंख्या को लेकर शोध करने के लिए जाना जाता है। वह भारत को लेकर अपनी आर्थिक रिपोर्ट जारी कर रहा है। इस रिपोर्ट पर आम आदमी विश्वास नहीं कर पा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट का हवाला देकर मोदी सरकार अपने पक्ष में वातावरण बनाने का काम करती है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद यही माना जा रहा है, कि मोदी सरकार द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर देश एवं दुनिया में जो चिंता जाहिर की जा रही थी। भारतीय आर्थिक परिदृश्य में सरकार की स्थिति को मजबूत करने के लिए इस तरीके की रिपोर्ट प्रायोजित की गई है।

अमेरिकी शोध संस्थान वर्ल्ड पापुलेशन रिव्यू ने अपनी रिपोर्ट में जानकारी देते हुए लिखा है ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 2.3 ट्रिलियन डॉलर की है। वहीं फ्रांस की अर्थव्यवस्था का आकार 2.7 ट्रिलियन डॉलर है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2.94 ट्रिलियन डॉलर का बताते हुए भारत को विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया गया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है की क्रय शक्ति और समानता (पीपीपी) के आधार पर भारत का जीडीपी 10.51 ट्रिलियन डॉलर का है। जो जापान और जर्मनी से भी आगे है। भारत में अधिक आबादी के कारण प्रति व्यक्ति जीडीपी 2170 डालर की है। जनसंख्या के आधार पर अमेरिका में प्रति व्यक्ति जीडीपी 62794 डॉलर की है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि भारत की तीसरी तिमाही में जीडीपी की दर कमजोर रह सकती है। शोध कर्ताओं ने रिपोर्ट में इसे 5 फ़ीसदी के आसपास बताया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर पिछले 2 साल से काफी चिंताएं राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों द्वारा जताई जा रही हैं। पिछले 2 वर्षों में भारतीय आर्थिक स्थिति किसी से भी छिपी हुई नहीं है। बड़ी-बड़ी कंपनियां दिवालिया हो रही हैं। बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ रहा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों का राजस्व घट रहा है। औद्योगिक गतिविधियां हर तिमाही में लगातार घट रही हैं। लोगों की क्रय शक्ति घटती जा रही है। सरकार सार्वजनिक वित्तीय एवं कारोबारी संस्थाओं का निजीकरण कर रही है। सरकार लगातार अपनी हिस्सेदारी घटा रही है। घाटे में चल रहे बैंकों को बचाने के लिए सरकार बैंकों को मर्ज कर रही है इसके बाद भी जो रिपोर्ट जारी की गई है। उस पर किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा है। इस रिपोर्ट पर ठीक वैसे ही प्रतिक्रिया हो रही है। जैसे चुनाव के पूर्व सर्वे एजेंसियों द्वारा किसी राजनीतिक दल के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। लगभग ऐसी ही प्रतिक्रिया अमेरिकी शोध संस्थान की इस रिपोर्ट पर आमजनों की हो रही है।

रिपोर्ट को विश्वसनीय बनाने के लिए 1990 के पश्चात भारत में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था। विदेश व्यापार और निवेश जो कार्य कांग्रेस सरकार के समय हुआ था। उसी को आधार बनाकर भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने का आधार बनाया गया है। किंतु यह रिपोर्ट ऐसे समय पर आई है, जब रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर को 6.6 फ़ीसदी से घटाकर 5.4 फ़ीसदी कर दिया है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एवं अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा भी जीडीपी के अनुमान को लगातार हर तिमाही में घटाने का काम किया जा रहा है। ऐसे समय पर अमेरिकी शोध संस्थान की यह रिपोर्ट मोदी सरकार को मलहम लगाने जैसी साबित हो रही है। किंतु इस पर विश्वास कोई नहीं कर पा रहा है। जिस अमेरिकी रिपोर्ट का प्रकाशन किया गया है।

उसकी विश्वसनीयता एवं अर्थव्यवस्था को लेकर जो बात कही जा रही है। वह लोगों के गले नहीं उतर रही है। उक्त संस्थान का विश्व स्तर पर आर्थिक व्यवस्था को लेकर कोई विश्वसनीयता नहीं है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद आम लोगों आर्थिक विशेषज्ञों और राजनीतिक क्षेत्र में जो प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इस रिपोर्ट को सरकार के प्रायोजित प्रचार तंत्र के रूप में देखा जा रहा है। इस रिपोर्ट से सरकार को आंतरिक रूप से अर्थव्यवस्था को लेकर कोई राहत मिलेगी, ऐसा समझ में नहीं आता है। जिस तरह से मोदी सरकार प्रायोजित कार्यक्रमों के जरिए अपनी छबि तैयार करती है। पिछले 6 वर्षों में मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के माध्यम से जो प्रचार तंत्र सरकार द्वारा तैयार किया गया है। वह आम आदमी अब समझने लगा है। जिसके कारण केंद्र की मोदी सरकार विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है। रिपोर्ट को आधार देने के लिए जनसंख्या को आधार बनाकर, रिपोर्ट को विश्वसनीय बनाने का प्रयास जरुर किया गया है। वह अपने आप में स्वयं विरोधाभास उत्पन्न करने वाला है।

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