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(विचार मंथन) काम की जीत

(विचार मंथन) काम की जीत

-सिद्वार्थ शंकर


दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने भाजपा और कांग्रेस पर झाड़ू लगा दिया है। कुल पड़े मतों का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा हासिल कर केजरीवाल तीसरी बार दिल्ली का ताज पहनेंगे। पंजाब राजस्थान और मध्य प्रदेश के बाद दिल्ली ने साबित किया है कि विधानसभा चुनाव में जनता सिर्फ स्थानीय मुद्दों को तरजीह देती है। शाहीनबाग का मुद्दा भले ही गले नहीं उतरा हो लेकिन भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत जरूर की है। कहा जा रहा है कि दिल्ली के दंगल में देर से कूदी। शाहीनबाग से माहौल बदलने की कोशिश हुई। शुरुआत में केजरीवाल की हवा तेज थी लेकिन अमित शाह के आक्रामक प्रचार ने हालात बदल दिए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। केजरीवाल ने चालाकी से दिल्ली के मुद्दों पर फोकस करना जारी रखा। यह आप के पक्ष में गया। दूसरी ओर कांग्रेस ने मानो शुरू से ही हार मान ली थी। दिल्ली के दंगल में सीधी जंग भाजपा और केजरीवाल के बीच हुई। दिल्ली की पब्लिक ने स्थानीय मुद्दों पर वोट दिया। स्लम, अनियमित कालोनियों और ग्रामीण इलाकों में केजरीवाल की पार्टी का जबर्दस्त प्रदर्शन इसका उदाहरण है।

यह संकेत देता है कि केजरीवाल सरकार ने जिस तरह से 200 यूनिट तक बिजली फ्री कर दी, पानी का बिल कम कर दिया, स्कूलों की हालत सुधारने के लिए काम किया और मोहल्ला क्लीनिक खोले, ये जनता को भा गया। धारा 370, एनआरसी और राम मंदिर जैसे मुद्दे जमीनी हकीकत में दफन हो गए। एक आम दिल्ली वाले को आप का झाड़ू अपना लगा। भावनात्मक मुद्दों से वो प्रभावित नहीं हो पाए। हालांकि, यह चुनाव भाजपा के लिए एकदम से असरकारी नहीं रहा, यह मानना भूल होगी। भाजपा ने वोट प्रतिशत बढ़ाने में सफलता हासिल की है और कांग्रेस की खस्ताहाली से भाजपा की झोली भरी है। एनआरसी, सीएए जैसे मुद्दों को भाजपा ने जोर शोर से उठाया। दिल्ली का शाहीनबाग सीएए विरोध की धुरी बना तो भाजपा ने बिना कोई संकोच किए इस पर जम कर हमला बोला। अमित शाह और पीएम मोदी ने भी चुनाव प्रचार में इसका जिक्र किया। शाह ने तो यहां तक कहा कि वोटर इतने जोर से कमल पर बटन दबाए कि करंट शाहीनबाग में महसूस हो। पर ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। शाहीनबाग जिस ओखला विधानसभा क्षेत्र में आता है वहां भी आप ने जीत दर्ज की। इससे स्पष्ट है कि वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश फेल हो गई है।

केजरीवाल की व्यक्तिगत छवि का फायदा भी आप को मिला। जैसे केंद्र में नरेंद्र मोदी की छवि है वैसे ही आप कार्यकर्ताओं ने केजरीवाल की छवि पेश की। उन पर भ्रष्टाचार के कोई बड़े आरोप नहीं है। जो थे वो साबित नहीं हो पाए। लोगों तक उनकी आसान पहुंच ने भी आप की लोकप्रियता बनाए रखी। उन्होंने मैनिफेस्टो में जो वादे किए हैं उस पर दिल्ली ने ज्यादा भरोसा जताया। आज अगर आप की जीत हुई है तो मतलब साफ है कि भाजपा ने स्थानीय चुनावों के ट्रेंड को नहीं समझा। शीला दीक्षित से भी उनकी तुलना की जा सकती है। जिस तरह शीला ने स्थानीय विकास के मुद्दे पर तीन बार सत्ता हासिल की, उसी तर्ज पर केजरीवाल बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा के पास कोई चेहरा नहीं था। नरेंद्र मोदी के चेहरे पर 2014 से 2018 के बीच भाजपा ने कई विधानसभा चुनाव जीते लेकिन 2018 से ट्रेंड बदल गया। गुजरात में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी। राजस्थान-मध्य प्रदेश में पार्टी को शिकस्त मिली। स्थानीय नेतृत्व को उभारने और प्रमुखता देने के बदले मोदी पर निर्भरता ने भाजपा का नुकसान किया। दिल्ली में मनोज तिवारी भाजपा के अध्यक्ष हैं, लेकिन कभी भी उन्हें सीएम पद का उम्मीदवार नहीं बताया गया। पार्टी ने मोदी के चेहरे पर ही भरोसा किया क्योंकि कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें उसकी झोली में गई। मतलब साफ है कि पार्टी ने स्थानीय चुनावों के ट्रेंड को नहीं समझा।

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