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10 मई 1857 की क्रांति पर विशेष: जंग ए आजादी 1857 की क्रांति में रहा है बसौद गांव का महत्वपूर्ण योगदान

10 मई 1857 की क्रांति पर विशेष: जंग ए आजादी 1857 की क्रांति में रहा है बसौद गांव का महत्वपूर्ण योगदान

बागपत। 10 मई 1857 ई. को मेरठ छावनी से भारत का स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ, जिसमें बागपत क्षेत्र में भी क्रांति आयी। इस क्षेत्र के ग्रामीणों ने यहाँ से अंग्रेजी शासन की जडो को उखाड़कर फेंक दिया था।

युवा चेतना मंच के संस्थापक मास्टर सत्तार अहमद ने बताया कि महाक्रांति गांव बसौद के साधारण किसान क्रांतिकारियों ने दिल्ली में लड रहे भारतीय क्रान्तिकारियों की फौज को रसद व जरुरी सामान पहुंचाने की जिम्मेदारी ली। इस क्षेत्र के क्रांतिकारियों का नेतृत्व बाबा शाहमल कर रहे थे। उन्होंने बसौद की जामा मस्जिद को रसद व गोला बारूद एकत्र करने के लिए भौगोलिक व सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल चुन लिया था। यही पर बाबा शाहमल अपने साथियों के साथ ठहरा करते थे तथा गोपनीय मीटिंग करते थे। जब गुप्तचरों द्वारा अंग्रेजों को पता चला कि बसौद की जामा मस्जिद व आस पास में रसद का बहुत बडा भण्डार है तथा बाबा शाहमल अपने साथियों के साथ यही ठहरे हैं, तो 16 जुलाई 1857 ई को अंग्रेजी सेना मेजर विलियम के नेतृत्व में तोपों के साथ बसौद पर हमला करने के लिए निकली। रात में अंग्रेजी फौज ने डालूहेडा हिण्डन नदी पर कैम्प किया और अगले दिन 17 जुलाई को यह फौज डौला गाँव पहुँचकर यमुना नहर के किनारे चलते हुए भौर में ही बसौद पहुंची, मगर बाबा शाहमल रात में ही साथियों सहित बसौद से निकल चुके थे।

अंग्रेजों और ग्रामीणों के बीच जोरदार संघर्ष हुआ। इस युद्ध में वहाँ मौजूद सभी पुरुषों ने शहादत दी। मस्जिद में मौजूद दो गाजी भी बहादुरी के साथ लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। अंग्रेजों द्वारा रसद के भण्डार को आग लगा दी गई, परन्तु नमी और उसके अन्दर बारुद फटने के कारण उन्हें आग लगाने में सफलता नहीं मिली। इस कत्लेआम के बाद जब अंग्रेजी फौज वापस लौट रही थी तो अन्त में डा. केनन के नेतृत्व में 10 घुड़सवार गाँव में रह गये। बचे हुए निर्भय ग्रामीणों ने अपनी आँखों के सामने अपने सम्बन्धियों को मरते हुए देखने के बावजूद असाधारण साहस का परिचय देते हुए खेतों व तालाब से निकलकर पुनः अंग्रेजों पर हमला बोल दिया, जिसमें 180 ग्रामीण यौद्धा दूसरे चरण की लड़ाई में शहीद हो गये। बसौद के इस युद्ध का प्रकरण लगभग 10 घंटे चला। गाँव में 15 लोग जिंदा मिले, जिन्हें पकड़ कर शाम के वक्त गाँव के बाहर कमाण्डर के आदेश पर बरगद के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया गया तथा पूरे गाँव को आग लगा दी गयी। यहाँ के लोगों की जमीनें जब्त कर ली गयी। बाद में बची औरतों व बच्चों से यह गाँव आबाद हुआ। यह भारत की आजादी आंदोलन में अनोखा उदाहरण है।

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