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तो भारत लेगा चीन से 1962 का बदला ?

तो भारत लेगा चीन से 1962 का बदला ?

-आर.के. सिन्हा

भारत-चीन के बीच पूर्वी लद्दाख सीमा पर जो कुछ गुजरे दिनों हुआ उसके लिए चीन को माफ तो नहीं किया जाएगा और न ही किया जाना चाहिए। पड़ोसी मुल्कों के साथ सीमा विवादों को सामान्य प्रक्रिया बातचीत से हल करने की ही होती है। बातचीत सौहार्दपूर्ण वातावरण में ही होनी चाहिए। जो देश इससे हटकर चलता है, इसका अर्थ है कि वह देश विश्व समुदाय की तरफ से तय कूटनीतिक नियमों की खुलेआम अवेहलना कर रहा है। चीन ने भी तो यही किया है।

अब चीन की आंखें भी खुल गई हैं क्योंकि भारत ने भी दोनों देशों के बीच की लगभग साढ़े चार हजार किलोमीटर लंबी सरहद पर लड़ाकू विमानों से लेकर दूसरे प्रलयकारी अस्त्र तैनात कर दिए हैं। अब चीन की किसी भी हरकत का कायदे से जवाब देने के लिए भारत की थल-जल और वायुसेना तैयार है। भारत के लिए भी यही सुनहरा अवसर है कि वह चीन से अपनी 1962 की शर्मनाक घुटना टेक पराजय का बदला ले ले। 1962 से लेकर अबतक भारत की कई पीढ़ियां उस हार की कहानी सुन- सुनकर बड़ी हुई। लेकिन अब भारत को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। हमने देख लिया कि गलवान घाटी में जो कुछ हुआ उसके खिलाफ दुनिया का कोई भी देश भारत के हक में खुलकर खड़ा नहीं हुआ। वे देश भी चुप रहे जो चीन द्वारा भयंकर रूप से प्रताड़ित हैं। इनमें जापान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम और ताईवान शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन को कोविड-19 से लेकर अन्य विषयों पर लगातार कोसते रहते हैं लेकिन इसबार उनकी बार-बार फिसलने वाली जुबान भी सिल गई। उन्होंने भारत और चीन के बीच लद्दाख सीमा के पास विवाद सुलझाने के लिए मध्‍यस्‍थता की पेशकश की थी। ट्रंप ने अपने एक ट्वीट में लिखा "हमने भारत और चीन दोनों को सूचित कर दिया है कि दोनों देशों के बीच चल रहे सीमा विवाद को लेकर अमेरिका मध्यस्थता कराने को तैयार, इच्छुक और सक्षम है।" पर जब दोनों देश के जवान गलवान घाटी में भिड़े तो वे गायब हो गए।

सबक भारत के लिए

यह सब भारत के लिए भी सबक होना चाहिए। वर्तमान में सारी दुनिया एक इस तरह के निराशाजनक दौर से गुजर रही है, जहां कोई ढंग का विश्व स्तर का नेता बचा नहीं है। एक इस तरह का ऐसा नेता जिसका सारी दुनिया पर नैतिक असर हो। बराक ओबामा के बाद अब सिर्फ बौने कद के ही नेता हैं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी को बहुत सोच-समझकर कदम बढ़ाने होंगे। जहां हमें बातचीत के रास्ते से नहीं भटकाना है, वहीं हम अब शुद्ध रूप से रक्षात्मक रवैया भी नहीं अपना सकते। एक बात याद कर लें कि 1962 के युद्ध के वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी जैसी चमत्कारी शख्सियत जिन्दा थी। उनका सारा विश्व सम्मान करता था। पंडित नेहरू के आग्रह पर ही सही पर उन्होंने चीन को तब साफ और खुले शब्दों में समझा दिया था कि यदि उसने युद्ध विराम नहीं किया तो अमेरिका युद्ध में कूद पड़ेगा। उसके बाद चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम किया था और साथ ही विवादित क्षेत्र से अपनी वापसी की घोषणा भी की, तब युद्ध खत्म हो गया था। लेकिन, यह भी याद रखा जाए कि तब भारत में अमेरिका के राजदूत जॉन गेलब्रिथ भारत सरकार को सलाह दे रहे थे। क्या अब वह स्थिति है? नहीं न। इसलिए सरकार को अपने कदम बहुत सोच-विचार करके ही आगे बढ़ाने होंगे। क्योंकि सरकार के ऊपर उल-जलूल सवालों की बौछार चालू हो गई है। पहले कहा जा रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने सैनिकों के शहीद होने के बाद जो बयान दिया उसमें चीन का उल्लेख ही नहीं किया। परोक्ष रूप से कहा जा रहा था कि हम चीन से भयभीत हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने सर्वदलीय बैठक में चीन पर बार-बार बेबाकी से निशाना साधा। क्या अब भी कोई कहेगा कि देश चीन के आगे नतमस्तक हो रहा है? मोदी सरकार से सवाल जरूर पूछिए। हरेक भारतीय को सवाल पूछने का हक़ है। पर चीन के प्रवक्ता या देश के शत्रु बनकर नहीं।

इन सवालों को तो देखिए

एक बात यह भी जरूरी है कि सवाल प्रासंगिक और तथ्यों पर आधारित होने चाहिए। कुछ वामपंथी विचारधारा से रंगे हुए अखबार दावा करते रहे कि चीन ने दस भारतीय सैनिक अपने कब्जे में रखे हुए थे। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से जब इस खबर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि चीन ने किसी भारतीय सैनिक को बंधक नहीं बनाया। जब यह खबर आई तो एक कथित मशहूर अखबार ने अपनी वेबसाइट पर खबर लिखते समय अपनी तरफ से "प्रेजंटली" जोड़ दिया कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि `इस समय भारत का कोई बंधक नहीं है।' साथ में यह भी लिखा कि चीन ने दस बंधक भारतीय सैनिक छोड़ दिए। जबकि चीन ने भारतीय सैनिकों को बंधक बनाए जाने की खबर का खंडन किया था। ऐसे अख़बारों पर सरकार को तुरंत उचित कार्रवाई करनी चाहिये।

अब यह सवाल भी पूछे जा रहे हैं कि निहत्थे सैनिकों को क्यों सरहद पर भेजा गया? निहत्था रखने या हथियार का इस्तेमाल न करने की संधि ड्रैगन से किसने की थी, उन्हें यह पता होना चाहिये कि 1993,1996 और 2005 में किसकी सरकार थी? सच तो यह है कि तीसरा मोर्चा सहित किसी की सरकार रही हो, सब ड्रैगन से डर कर ही रहे। अब जबकि इस कोरोना काल में जवाब देने की कोशिश हो रही है तो 20 जवानों के शहीद होने से अंदर से खुश हो रहे एक विचारधारा विशेष के लोग मोदी से 56 इंच का सीना और लाल आंखें दिखाने की व्यंगात्मक मांग कर रहे हैं। अब इन्हें कौन बताए कि जिन बंकरों को सीमा पर सेना ने बनाया था, चीन के दबाव में मनमोहन सिंह शासनकाल में उन्हीं सैनिकों से तुड़वाया गया। अजीब बात यह है कि 1962 के युद्ध में जो लोग चीन के साथ खड़े थे, वे इसबार भी चीन के साथ दिख रहे हैं। आप समझ गए होंगे कि इशारा किन जयचंदों की तरफ है। खैर, देश की तमाम जनता चीन से दो-दो हाथ करने के लिए सरकार के साथ खड़ी है। यही देश के लिये महत्वपूर्ण है। क्योंकि युद्ध तो सेना के साथ देश की जनता लड़ती है। दारू पीकर बुद्धि बघारने वाले कुछ कथित लिबरल या सेक्युलरवादियों को पूछता ही कौन है। इन्हें देश जान-पहचान चुका है। ये चीन की निंदा नहीं कर रहे हैं। ये सवाल पूछ रहे हैं भारत सरकार से। इन्होंने देश के 20 शूरवीरों के बलिदान पर शोक भी जताया हो, ऐसा याद नहीं आता। इन्हें तो अभूतपूर्व संकटकाल में भी देश से गद्दारी करनी है। क्या कोविड-19 या चीन के साथ अकारण पैदा हुआ विवाद मोदी सरकार के कारण उत्पन्न हुआ है? पर ये हर स्तर पर मोदी सरकार पर ही निशाना साध रहे हैं।

चीन भी जानता है कि नेहरू के भारत और मोदी के भारत में फर्क क्या है? हम चीन को छेड़ेंगे नहीं क्योंकि ऐसी आक्रामक और विस्तारवादी नीति भारत की कभी रही नहीं है। लेकिन यह तय है कि यदि इसबार चीन ने छेड़ा तो उसे किसी भी हालत में छोड़ने के मूड में मोदी जी तो नहीं दिखते। वैसे भी 1962 और 2020 की तुलना करने वाले मुगालते में हैं। उन्हें ख्याली पुलाव पकाने और चीन को परोसने दीजिये। क्या हर्ज है।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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