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जीवन को दांव पर लगाकर लौट रहे है अपने घर..कौन है इनकी सुरक्षा का जिम्मेदार ..?

बागपत-व्यवस्था के ठेकेदारों से हमारा सवाल है कि क्या इनका जीवन, जीवन नहीं है ? क्या यह लोग इंसान नहीं हैं ? भूख से ये मर रहे हैं, हजारों किलोमीटर पैदल चलने की मार ये झेल रहे हैं, रेल की पटरियों पर ये कट रहे हैं, बेरोजगारी सबसे पहले इनकी जिंदगी छिनेगी। बिहार के रहने वाले यह मजदूर हरियाणा की तरफ से यमुना पार कर बागपत आ रहे थे, पता नहीं किस राज्य से आ रहे होंगें, यमुना के पुल पर पुलिस को देखकर लाचारों ने अपनी जिंदगी ही दाँव पर लगा दी। इन्हें क्या पता था कि कोई संवेदनहीन पुलिसकर्मी यहाँ भी घूम रहा है, वो जो भी महान कलाकार होगा उसने दोबारा फिर इन गरीबों को मौत के मुँह में धकेल दिया और धमकाकर वापस कर दिया, वह भी उसी रास्ते से। यह तक नहीं सोचा कि वह बेचारे कितने मजबूर हैं। आखिर यह कुव्यवस्था क्यों ? समय रहते क्यों नहीं चेती थी सरकार ?

क्यों नहीं मार्च के पहले सप्ताह में ही यातायात के तमाम सरकारी संशाधनों को फ्री चलाकर प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मंजिल तक पहुँचाया ? मार्च के शुरू में ही सरकार यह घोषणा करती की होली के बाद लॉक डाउन करेंगें इसलिए सब लोग कम से कम दो महीने के लिए सचेत हो जाएं। तमाम उद्योगों अथवा कारखानों के मालिकों को सरकार यह निर्देश देती की उसका कोई आदमी सड़क पर नहीं मिलना चाहिए, कारखानों का प्रबंधतंत्र सरकार के साथ कॉर्डिनेट करके लोगों को घर भिजवाने की जिम्मेदारी निभाता, उद्योगजगत को इन लोगों की बाद में भी तो आवश्यकता पड़ेगी, इसलिए इतनी मानवता तो बनती थी। लेकिन यह सब तब होता जब सरकार के पास कोई काबिल प्लान होता। अंधे का तीर बिटौड़े में वाली कहावत फलीभूत हो रही है, मरता मरो और जीता जिओ। ईश्वर रहम कर और अपने कहर को कम कर। यह तो गरीबों, मजदूरों और किसानों का मुल्क है, यह अमेरिका और चीन नहीं है। यहाँ तो 80 फीसदी जनता रोज कुआँ खोदती है और रोज पानी पीती है। सरकार से कोई उम्मीद नहीं है इसलिए प्रभु कृपा कर।

-डॉ कुलदीप उज्जवल, पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार

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