Top

फर्रुखाबाद लोकसभा सीट: गठबंधन व प्रसपा की लड़ाई में भाजपा को मिल सकता है फायदा

फर्रुखाबाद लोकसभा सीट: गठबंधन व प्रसपा की लड़ाई में भाजपा को मिल सकता है फायदा


फर्रुखाबाद। फर्रुखाबाद संसदीय क्षेत्र में छिड़ी चुनावी महाभारत में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। सपा-बसपा के गठबंधन के बाद प्रगतिशील समाजवादी पार्टी—लोहिया ने भी जहां ताल ठोक दी है। वहीं ऐसे में भाजपा उम्मीदवार को इसका फायदा मिल सकता है। इस तरह संसदीय क्षेत्र में वर्ष 2014 इतिहास दोहराया जा सकता है।

वर्ष 2014 में हुए लोक सभा चुनाव में टिकट कट जाने से नाराज तत्कालीन होमगार्ड मंत्री नरेंद्र सिंह यादव के पुत्र सचिन उर्फ लव यादव ने सपा से बगाबत कर निर्दलीय चुनाव लड़ कर सपा के वोट काट कर भाजपा के उम्मीदवार मुकेश राजपूत की मुश्किलें आसान कर दी थी। इस चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार मुकेश राजपूत ने 4,06,195 वोट प्राप्त कर शानदार जीत दर्ज कराई थी।

सपा के रामेश्वर सिंह यादव को 2,55,693 वोटो पर ही सन्तोष करके करारी हार का मुंह देखना पड़ा था। ठाकुर मतदाताओं के सहारे चुनाव लड़े बसपा के जय वीर सिंह 1,14,521 तथा कांग्रेस के सलमान खुर्शीद को 95,535 वोट मिले थे। निर्दलीय उम्मीदवार सचिन यादव ने 58703 वोट काट कर सपा की नैय्या डुबाने का काम किया था। इस बार चौथे चरण में 29 अप्रैल को होने जा रहे चुनाव में कांग्रेस से पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार मनोज अग्रवाल के बसपा समर्थित मुस्लिमों के वोट बैंक में जहां सलमान खुर्शीद सेंधमारी कर सकते हैं। वहीं यादव मतदाताओं को प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार उदयपाल सिंह यादव अपनी तरफ मुखातिब करने में जुटे हुए हैं। वहीं मौजूदा चुनावी समीकरण 2014 में हुए लोक सभा चुनाव का इतिहास दोहराने की ओर संकेत दे रहे हैं।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आजादी के बाद से अब तक हुए लोक सभा चुनाव पर यदि नजर डाली जाए तो यहां की जनता ने अधिकांश जनप्रतिनिधियों को दो-दो बार जीत दिलाते हुए संसद में भेजा है। आजादी के बाद 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के मूलचंद दुबे सांसद बने। इसके बाद लगातार तीन चुनाव में जनता ने उन पर भरोसा जताया। 1957 और 1962 के आम चुनाव में भी उन्होंने परचम लहराया। हालांकि 1962 के चुनाव में जीतने के कुछ दिनों बाद ही उनकी मौत हो गई। इसके बाद मुखर समाजवादी नेता और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी राम मनोहर लोहिया ने पहली बार फर्रुखाबाद से कांग्रेस प्रत्याशी को मात दी। 1967 आते-आते फर्रुखाबाद लोकसभा क्षेत्र दो हिस्सों में बंट गया। अब एक लोकसभा क्षेत्र कन्नौज का जन्म हो चुका था। इस बार राम मनोहर लोहिया ने कन्नौज से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कराई।

उधर, फर्रुखाबाद सीट पर एक बार फिर अवधेश चंद्र राठौर ने जीत दर्ज कर कांग्रेस की वापसी कराई। 1971 में एक बार फिर उन्होंने जीत दर्ज की। 1977 और 1980 के चुनाव में जब जनता का कांग्रेस से मोहभंग हुआ तो जनता पार्टी से दयाराम शाक्य को दो बार संसद पहुंचाया।

1984 में खुर्शीद आलम खान (पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर जाकिर हुसैन के दामाद) ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। लेकिन 1989 के चुनाव में जनता दल की लहर आई और संतोष भारतीय सांसद की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब रहे। 1991 में खुर्शीद आलम खान के बेटे सलमान खुर्शीद ने राजनीति में कदम रखा और फर्रुखाबाद की जनता ने उन्हें भी हाथों हाथ लिया। इतना ही नहीं कांग्रेस पार्टी ने उन्हें मंत्री पद से भी नवाजा। इसके बाद 2009 में भी सलमान जीते और विदेश मंत्री बने।

फर्रुखाबाद की जनता ने जितना प्यार कांग्रेस को दिया उतना ही भाजपा और समाजवादी पार्टी को भी दिया। भाजपा के राजस्व मंत्री रहे ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने पैरवी कर इस लोक सभा क्षेत्र से 1996 में सच्चिदानन्द हरि साक्षी को पार्टी से टिकट दिलाया और उन्होंने जीत दर्ज की। इसके बाद 1998 के चुनाव में भी जनता ने लगातार साक्षी महाराज को सांसद चुना।

2004 और 2009 में भी जनता ने सपा के चंद्र भूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू को लगातार दो बार सांसद बनाया। 2014 के चुनाव में भाजपा ने वापसी की और मोदी लहर में मुकेश राजपूत ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रामेश्वर सिंह को डेढ़ लाख वोटों से मात देते हुए शानदार जीत दर्ज कराई।

फर्रुखाबाद लोकसभा से दो ही ऐसे सांसद हैं जिन्हें एक ही बार देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचने का मौका मिला। इसमें एक नाम जनता दल के संतोष भारतीय का है। इसके अलावा खुर्शीद आलम का। इसके अलावा हर उम्मीद वार कम से कम दो बार विजयी हुआ।

Share it
Top