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दोस्ती और दुश्मनी निभाने के कारण हमेशा याद किए जाएंगे अमर सिंह

दोस्ती और दुश्मनी निभाने के कारण हमेशा याद किए जाएंगे अमर सिंह

लखनऊ-उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद अमर सिंह के निधन के बाद जहां विभिन्न दलों के नेताओं की ओर से शोक संवेदना प्रकट करने का सिलसिला जारी है। वहीं उत्तर प्रदेश भी सियासत के इस चाणक्य कहे जाने वाले नेता को याद कर रहा है।

समाजवादी पार्टी की बागडोर मुलायम सिंह यादव के हाथ में रहते अमर सिंह की पार्टी में हमेशा तूती बोलती रही। वहीं एक वक्त ऐसा भी आया जब इस कुनबे में बिखराव की सबसे बड़ी वजह अमर सिंह को माना गया और अखिलेश यादव उनके सबसे बड़े आलोचक बन गए। पार्टी से निष्कासित होने के बाद अमर सिंह ने भी मुलायम और अखिलेश की आलोचना करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। लेकिन, आज उनके निधन पर अखिलेश समेत अन्य नेता दु:ख व्यक्त कर रहे हैं। सियासी विश्लेषक इसके पीछे अमर सिंह का सियासी कौशल और उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध मानते हैं।

ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में प्रधानमंत्री मोदी ने अमर सिंह का लिया था नाम

अमर सिंह की उत्तर प्रदेश में सक्रियता के अन्तिम वर्षों पर नजर डालें तो योगी सरकार में अमर सिंह वर्ष 2018 में राजधानी में आयोजित ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के दौरान सुर्खियों में आये थे। भगवा कुर्ता पहनकर समारोह में पहुंचे अमर सिंह की मौजूदगी उनके नए सियासी तेवरों का बयान कर रही थी। उनकी कुर्सी सत्तारूढ़ दल के कई नेताओं से आगे थी।

तब उद्योगपतियों से रिश्तों के आरोपों पर विरोधियों पर पलटवार करते हुए मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुस्कुराते हुए कहा था कि अमर सिंह बैठे हैं। सबकी हिस्ट्री निकाल देंगे। इसके अगले दिन ही अमर सिंह ने कांग्रेस पर हमलावर होते हुए कहा कि कॉरपोरेट से संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री की आलोचना पूर्वाग्रही नजरिये से की जाती है। अंबानी और अडानी का विकास चार साल में नहीं हुआ। ये घराने दशकों पहले उस समय अस्तित्व में आए जब कांग्रेस सत्ता में थी।

अपने वक्त में रहे बेहद ताकतवर, लोगों को फर्श से अर्श पर पहुंचाया

वरिष्ठ पत्रकार बृजेश मिश्रा के मुताबिक वक्त से बड़ा ताकतवर कोई नहीं। सत्ता जिसकी मुट्ठी में थी। कॉरपोरेट-बॉलीवुड की जिसके यहां लाइन लगती थी, अमर सिंह वह नाम था। अपने वक्त में वह बेहद ताकतवर थे। समय बदला, दूर देश में उनकी गुमनाम मौत हुई। न जाने कितने राज, उनके सीने में दफन थे। वास्तव में वह दोस्त और दुश्मन, दोनों बहुत अच्छे थे।

वरिष्ठ पत्रकार अशोक राजपूत कहते हैं कि अमर सिंह ने राजनीति सहित अनेक क्षेत्रों में फर्श पर लोटे पड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों व फिल्म वालों को अर्श पर पहुंचाकर धन के साथ नाम भी कमवाया और राज्यसभा तक भी भिजवाया। वहीं कई लोगों के साथ उनकी दुश्मनी भी जगजाहिर है। वर्तमान में जेल में बन्द रामपुर से सपा सांसद आजम खान पार्टी में हाशिए पर, किसकी वजह से गए थे,ये सभी को पता है। इसके बाद अमर सिंह के किनारे होने पर ही उनका एक बार फिर पार्टी में रुतबा बढ़ा। अपने पास आने वाले को बड़ी से बड़ी आपदा से बचा लेने का जिगरा अमर सिंह में ही देखने को मिलता था।

लोगों की खूबियों की जानकारी से लेकर कमजोर नब्ज पकड़ने में माहिर

समाजवादी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के अनछुए पहलुओं को अपने कैमरे में कैद करने वाले वरिष्ठ फोटो पत्रकार मनमोहन शर्मा के मुताबिक अमर सिंह खुद धुरंधर राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ दूसरे राजनीतिज्ञों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी रखने वाले व्यक्ति थे। किस पार्टी के किस नेता से किस अंदाज में बात करनी है, उनके इस हुनर का दूसरा कोई भी जोड़ीदार आज तक न बन पाया। वह लोगों की खूबियों की जानकारी रखने से लेकर दूसरों की कमजोर नब्ज पकड़ने में माहिर थे। इन्ही गुणों के कारण जब वह समाजवादी पार्टी का हिस्सा बने तो अपने आप को चरम सीमा तक ले गए।

मुलायम ने बोला था अमर सिंह के निर्देशों का पालन नहीं करना मेरा अपमान

अमर सिंह के इसी जादू की वजह से एक दिन मुलायम सिंह यादव को भरी सभा में कहना पड़ा "अगर कोई भी अमर सिंह के खिलाफ मुझसे शिकायत करेगा या उनके दिए दिशा निर्देशों का पालन नहीं करेगा तो इसका मतलब है कि वो मेरा और समाजवादी पार्टी का सम्मान नहीं करता है।" ये था अमर सिंह का जादू जो सर चढ़ कर बोलता था। बाद में बदले सियासी परिदृश्य में अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी के साथ-साथ मुलायम सिंह को भी कई बार अपशब्द कहे। लेकिन, शायद उनकी विशेषताओं के कारण ही मुलायम सिंह ने कभी धीरज नहीं खोया और अपनी दोस्ती का मान रखते हुए एक बार भी अमर सिंह पर पलटवार नहीं किया।

बसपा के सम​र्थन वापस लेने पर सपा की सरकार बनाने में निभायी अहम भूमिका

उत्तर प्रदेश की सियासत में समय-समय पर अमर सिंह की भूमिका की बात करें तो वर्ष 2003 के अगस्त में प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली बसपा और भाजपा की मिलीजुली सरकार गिर गई। समाजवादी पार्टी के पास बहुमत से बहुत कम संख्या थी। कहा जाता है कि मुलायम सिंह सरकार बनाने के बहुत इच्छुक भी नहीं थे। तब सपा की सरकार बनाने में अमर सिंह का बहुत बड़ा रोल रहा था। इस दौरान बसपा में जो ऐतिहासिक टूट हुई उसमें भी उनकी ही अहम भूमिका थी। बसपा नेता स्वर्गीय राजेंद्र सिंह राणा और मेरठ के नेता हाजी याकूब कुरैशी को आगे कर पार्टी को चरणों में तोड़ा गया।

अमर की ताकत बढ़ने पर कई वरिष्ठ नेताओं की अहमियत हुई कम

वर्ष 2003 से 2007 तक अमर सिंह की ताकत अपने उठान पर थी। समाजवादी पार्टी में बड़े बड़े नेताओं को उनके पैर छूते देखा जा सकता था। तब कई पुराने नेता उनके उत्थान से असहज हुए। इनमें जनेश्वर मिश्र, बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खां, मोहन सिंह, भगवती सिंह, पारसनाथ यादव शामिल थे। लेकिन, इसकी परवाह न अमर सिंह ने की न नेताजी ने। हालत ये हो गई थी कि कहा जाने लगा यदि सपा में रहना है तो अमर सिंह को सहना है। अहम बात ये भी रही कि अमर सिंह ने इस दौरान सपा के युवा नेताओं को आगे बढ़ाया।

इस दौरान राजनीति, फिल्म, उद्योग, नौकरशाही और पत्रकारिता जगत की कई बड़ी हस्तियां उनके सामने नतमस्तक थीं। विकास परिषद के अध्यक्ष के रूप में अनिल अंबानी, आदि गोदरेज, सहारा, लेंको समूह से लेकर तमाम उद्योगपति उनके बुलाने पर लखनऊ में नजर आते थे। फिल्म में अमिताभ बच्चन से उनका संबंध जगजाहिर था। नौकरशाही के तो कहने की क्या। इसी बीच उनकी एक ऑडियो सीडी भी आई जिसमें राजनीति, फिल्म और पत्रकारिता के तमाम किस्से खुले।

अखिलेश का वर्चस्व बढ़ने के साथ होने लगे किनारे

साल 2009 से अमर सिंह का ढलान शुरू हुआ। लोकसभा चुनाव के पहले तक तो वे खूब चढ़े हुए थे। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से तालमेल के लिए उन्होंने कांग्रेस के सामने अपमानजनक प्रस्ताव रखा। बाद में कांग्रेस ने अकेले लड़ते हुए सर्वाधिक सीटें जीतीं। इसके बाद सपा में अखिलेश यादव का प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ।

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह के मुताबिक अमर सिंह के नेपथ्य में जाने की यहां से शुरुआत हुई। उन्हें लगता रहा कि जिस तरह से मुलायम सिंह सपा के दूसरे नेताओं की कीमत पर उन्हें तवज्जो देते रहे हैं वही आगे भी होता रहेगा। लेकिन, अखिलेश यादव के प्रादुर्भाव के बाद अमर सिंह किनारे होने लगे। वर्ष 2010 में उन्होंने अपनी पार्टी बनाकर पूर्वांचल में जमने की कोशिश की पर सफल नहीं हुए। बाद में अस्वस्थ होने के कारण उनकी उत्तर प्रदेश में स​क्रियता धीरे-धीरे कम होती चली गई। अपने अंतिम कई वर्षों में अमर सिंह सत्ता के गलियारों में तो कमजोर हुए ही थे शारीरिक और मानसिक रूप से ढल गए थे।

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