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(विचार-मंथन) होली के पर्व का संदेश

(विचार-मंथन) होली के पर्व का संदेश


लेखक- सिध्दार्थ शंकर


समाज में हर त्योहार का अपना महत्व होता है। इनमें होली सबसे खास है क्योंकि इस में समाज का हर वर्ग रंग में सराबोर होकर उत्साह से भरा दिखता है। रंगों के इस त्योहार में किसी का भेदभाव नहीं होना चाहिए, तभी होली के रंग का उत्साह समाज को खुशहाल बना सकता है। होली में रंग खेलने के अलावा दूसरा सब से बड़ा महत्व होता है कि इसमें एक-दूसरे से मिलने के लिए होली मिलन का आयोजन होता है। होली भारतीय संस्कृति का एक महान पर्व है। होली सामाजिक समरसता, भाईचारे, प्रेम व एकता का संदेश देने वाला पर्व है। कहा जाता है कि होली के अवसर पर लोग अपनी पुरानी से पुरानी शत्रुता को भी समाप्त कर होली का आनंद उठाते हैं। होली कई प्रकार से आनंददायक पर्व है। होली लगभग पूरे भारत में तो मनायी जाती है साथ ही विदेशों में बसे भारतीय भी अपने पारंपरिक रीति रिवाजों के साथ होली का आनंद उठाते हैं।

होली वसंत ऋतु में फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व है। यह पर्व वसंत का संदेशवाहक है। इस पर्व के प्रमुख अंग हैं राग और संगीत। होली पर्व एक प्रकार से बसंत पंचमी से प्रारम्भ हो जाता है और षीतलाआष्टमी के साथ संपन्न होता है। वसंत ऋतु होते ही सामाजिक वातावरण होलीमय होने लग जाता है। चंूकि राग और संगीत होली के प्रमुख अंग हैं। अत: इस समय प्रकृति भी रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था में होती है। बसंत ऋतु व होली के चलते कामुकता चरम पर होती है। लेकिन आज के युग में इसमें अश्लीलता व फूहड़पन भी आ गया है। लोग होली के इस पावन उमंग को गलत नजरिये से भी देखने लग गए हैं।

होली पर्व का उल्लेख कई विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रा वृतांत में भी किया है। मुगलकाल में भी यह पर्व बहुत ही उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता था। सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होंलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुस्लिम समाज के लोग भी मनाते थे। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के चित्र में जहांगीर को होली खेलते दिखाया गया है। षाहजहां के समय तक होली खेलने का अंदाज ही बदल गया था। शाहजहां के समय में होली को होली को इंद्र-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी कहा जाता था। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में भी दर्षित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।

होली के पर्व को लेकर कई तरह की कहानियां भी प्रचलित हैं। जिसमें हिरण्यकशिपु और प्रहलाद की कहानी सर्वाधिक प्रसिद्ध है। होली पर्व पूरे भारत में विभिन्न तरीकों से मनाया जाने वाला पर्व है। उत्तर प्रदेश में ब्रज की होली का अपना एक अलग ही रंग है। मथुरा आदि में लठमार होली का अपना एक अलग ही आनंद है। यहां पर होली का आनंद होलाष्टक से ही प्रारंभ हो जाता है। मथुरा क्षेत्र की होली का आनंद उठाने के लिए विदेशी अतिथि भी खूब आते हैं। पूरा का पूरा क्षेत्र अबीर, गुलाल से सराबोर हो जाता क्षेत्र है। मथुरा और वृंदावन क्षेत्र में होली का पर्व 15 दिनों तक मनाया जाता है। प्रदेष के कानपुर व उन्नाव आदि जिलों में तो होली का पर्व एक सप्ताह तक मनाया जाता है। अवध क्षेत्र में होली का गजब उत्साह देखने को मिलते हैं।

भारतीय फिल्मों में भी होली का पर्व बेहद रासरंग के वर्णित किया गया है। यह पर्व फिल्मों का पसंदीदा विषय है। पुरानी फिल्मों में तो होली है ही साथ ही अमिताभ बच्चन से लेकर आमिर खान तक की की फिल्मों में होली का खूब जोरदार ढंग से फिल्मांकन किया गया है। कई संगीतकारों से होली पर नायाब गीत लिखे हैं। आधुनिक रंग में होली बदरंग भी हो गई है। एक प्रकार से कलियुग की होली में लोग बदले की भावना से भी होली खेलने लग गए हैं। कुछ असामाजिक तत्व अपनी पुरानी शत्रुता निपटाने का भी प्रयास करते हैं। शराब पीकर हुड़दंग करना ही लोगों का पर्व हो गया है। होली प्रेम का त्यौहार है बदले की भावना का नहीं।

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