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मुद्दा: जेएनयू मूवमेंट के पीछे की सियासत

मुद्दा: जेएनयू मूवमेंट के पीछे की सियासत

विवादों से जेएनयू का पुराना नाता रहा है। हिन्दुस्तान की यही एक मात्र ऐसी यूनिवर्सिटी है जिसके परिसर में हमेशा कुछ न कुछ होता रहता है। विगत पंद्रह-बीस दिनों से भी वहां हंगामा कटा हुआ था। इस बार विवाद फीस बढ़ोत्तरी को लेकर खड़ा हुआ था। फिलहाल विरोध का पटाक्षेप हो चुका है। सरकार ने जेएनयू के लिए जो नए नियम लागू करने का आदेश दिया था छात्रों के भारी विरोध के बाद फिलहाल उसे वापस ले लिया है। कॉलेज में फिर से वही पुराने नियम यथावत रहेंगे। वैसे देखा जाए तो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यायल पिछले तीन सालों से लगातार चर्चा में है।

जेएनयू सन् 2016 से उस समय से चर्चाओं में है जब वहां देश-विरोधी नारे लगे थे। उस घटना के बाद वहां का पठन-पाठन माहौल काफी खराब हुआ। यूनिवर्सिटी की इमेज देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खराब हुई क्योंकि जेएनयू में हिन्दुस्तान के अलावा अन्य मुल्कों के छात्र भी पढ़ाई करते हैं। फीस बढ़ोत्तरी से माहौल और ज्यादा खराब न हो, इसलिए सरकार ने समझदारी का परिचय देते हुए विरोध की लपटों को तुरंत शांत कराया। जेएनयू को वाम विचारधारा का गढ़ कहा जाता है। इसी कारण वहां दो असामान्य विचारधाराओं के बीच टकराव होता है। जेएनयू के छात्र फीस बढ़ोत्तरी और ड्रेस कोड आदि को लेकर जो विरोध कर रहे थे उसके पीछे भी सियासत होने लगी थी। हालात इस कदर बिगड़े जिससे पुलिस को भी मोर्चा संभालना पड़ा।

जेएनयू छात्रों की आपत्ति वाली थ्योरी को भी समझना जरूरी है कि आखिर उनका विरोध किस बात का था? दरअसल, कॉलेज में लागू ताजे नियमों के अनुसार होस्टल की फीस में बड़ा फेरबदल किया गया था जो विगत पंद्रह साल के बाद किया गया था। नए नियम के मुताबिक हास्टल की फीस में बढ़ोत्तरी की गई। पहले डबल सीटर कमरे का भाड़ा मात्र दस रूपये हुआ करता था जो सालों से चला आ रहा था जिसे तीन सौ रुपये कर दिया गया। इसके अलावा सिंगल कमरे का किराया पहले बीस रुपए था जिसे बढ़ाकर छह सौ कर दिया गया। बस, इसी बढ़ोत्तरी का छात्र विरोध कर रहे थे। छात्र संगठनों का कहना था कि कॉलेज प्रशासन ने बिना छात्र यूनियन को सूचित किए गुपचुप तरीके से वृद्धि की जिसे छात्र संगठन कालेज प्रशासन से तत्काल प्रभाव से बढ़ी फीस को वापस लेने का दबाव डाल रहे थे, आखिरकार उनकी मांगों को माना गया।

यह बात सौ आने सच है कि उम्दा स्तर की शिक्षा के लिहाज से जेएनयू का आज भी कोई सानी नहीं है। किस्मत वालों को ही प्रवेश मिलता है। देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी यहां से शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र भारत का डंका बजा रहे हैं। हाल ही में अर्थशास्त्र में दिया गया नोबेल पुरस्कार, यहीं से निकले पूर्व छात्र अभिजीत बैनर्जी को मिला।

दिल्ली स्थित जेएनयू में समूचे हिन्दुस्तान से गरीब तबके और स्कॉलर प्राप्त छात्र शिक्षा ग्रहण करते हैं। कम से कम 40 फीसदी छात्र ऐसे होते हैं जो बेहद गरीब परिवारों से आते हैं। उनकी चिंता यही थी कि बढ़ी हुई फीस को वह कैसे चुका पाएंगे। छात्रों के बढ़ते विरोध को देखकर केंद्र सरकार सकते में आई। सरकार पहले दिन से ही उग्र छात्रों के मूवमेंट को शांत कराने में लग गई थी। अंतत: उन्हें सफलता मिली पर अभी भी कुछ छात्र आंदोलन कर रहे हैं।

जेएनयू में बीते 11 नंवबर को दीक्षांत समारोह था जिसमें भाग लेने शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक भी पहुंचे थे। उन्हें देखकर छात्र और उग्र हो गए। छात्रों ने मंत्री के निकले के सभी रास्तों को अवरोध कर दिया। इस कारण वह कई घंटों तक आडिटोरियम में ही फंसे रहे। सुरक्षाकर्मियों ने बाहर निकालने के काफी प्रयास किए लेकिन बाहर नहीं आ सके। एचआरडी मंत्री के अलावा दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी शामिल होने के लिए पहुंचे। उनको भी छात्रों के विरोध का सामना करना पड़ा। उनको भी छात्रों ने घेर लिया लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने उनको किसी तरह वहां से बाहर निकाला और वह दीक्षांत समारोह से निकल गए।

बहरहाल, छात्रों का मूवमेंट शांत हुआ है। कुछ दिनों बाद जेएनयू में परीक्षाएं आरंभ होनी हैं। जेएनयू अपनी शिक्षा सभ्यता के लिए पूरे संसार में विख्यात है। छात्रों पर पुलिस द्वारा पानी की बौछारें मारना, खींच-खींच उन पर डंडे बरसाना कतई सुखद नहीं। पुलिस कार्रवाई में कई छात्रों को हल्की चोटें आईं ? खबरें ऐसी भी मिली कि कुछ को हिरासत में भी लिया हुआ है। उन्हें तुरंत रिहा किया जाए लेकिन गौर से देखें तो छात्रों का मूवमेंट बेजा सा लगा। दरअसल, जितनी फीस वृद्धि की गई थी उससे कहीं ज्यादा पैसा छात्र अपने मोबाइलों में डाटा के रूप में फूंक देते हैं। आज के युग में पांच-छह सौ रूपए ज्यादा मायने नहीं रखते। उसके लिए इतना उग्र होना छात्रों को भी शोभा नहीं देता। अंत में बस इतना ही कहना है, शिक्षण संस्थाओं को किसी के कहने पर छात्रों को सियासी अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए, उन्हें शायद पता नहीं कि उनकी आड़ में लोग कितना सियासी लाभ उठा जाते हैं।

- रमेश ठाकुर

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