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चीन से प्रवासी पक्षी छत्तीसगढ़ में

चीन से प्रवासी पक्षी छत्तीसगढ़ में

दुलर्भ प्रजाति के प्रवासी पक्षी ग्रे हैडिड लेप्विंग सेंट्रल एशियन फ्लाईवे में हर साल इसी मार्ग से गुजर कर जाती है दक्षिण भारत। इस बार वह कुछ दिन गुजारने रूकी छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गाँव बेलौदी में। लंबे सफर में विश्राम करने और पोषण करने माइग्रेट पैसेज के रूप में कुछ दिन बीच में रूकती है, फिर स्थायी रूप से सर्दी गुजारती हैं किसी एक जगह पर।

दुर्ग से एक फोटोग्राफी के शौकीन अनुभव शर्मा ने हमें एक फोटो भेजी, दुर्लभ प्रवासी पक्षी ग्रे हेडेड लैप्विंग की जो इन दिनों मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के गाँव बेलौदी में देखा जा सकता है। हमने भी इसकी खोज-खबर ली। दो-तीन दिन से टिटहरी प्रजाति की इस चिडिय़ा को दुर्ग से 35-40 किमी दूर पाटन ब्लाक के ग्राम बेलौदी में स्पाट किया गया है। यह दुर्लभ संयोग है कि बेलौदी में यह चिडिय़ा रूकी है क्योंकि प्रवासी पक्षी लंबी यात्रा के दौरान सुस्ताने किसी-किसी जगह पर ही रूकते हैं। बर्ड वाचिंग का शौक रखने वाले राजू वर्मा ने बताया कि बेलौदी में एक सरकारी बांध है जहाँ प्रवासी पक्षियों की कभी-कभी आमद होती है और ऐसा होने पर वे तथा बर्ड वाचिंग में दिलचस्पी रखने वाले पाटन के अनुभव शर्मा जो तहसीलदार भी हैं, साइट पर इनके फोटो लेते हैं।

इस बार उन्होंने पाया कि यह ग्रे हेडेड लैप्विंग हैं। उन्होंने बताया कि यह प्रजाति चीन और जापान में पाई जाती है और सर्दियों से बचने के लिए प्रवास करती है। फिलहाल ग्रे हेडेड लैप्विंग बेलौदी के बांधा में कीड़े खाने में मगन है। जल्द ही अपनी लंबी यात्र का फ्यूल जब वो इन कीड़ों से जुटा लेगी तो फिर से निकल पड़ेगी। बताया जाता है कि ग्रे हेडेड लैप्विंग अक्टूबर माह के आखरी पखवाड़े में दक्षिण भारत पहुंच जाती हैं और यहां किसी झील में अपनी सर्दियां बिताती हैं।

फिर लंबा सफर पूरा कर दक्षिण चीन सागर पहुँच जाती हैं। पैसिफिक गोल्डन प्लोवर भी दिखी थी- बेलौदी के इसी बांध में। बीते दिनों पैसिफिक गोल्डन प्लोवर, यूरेशियन कुर्लु, विम्ब्रेल, ग्रीन सेंड पाइपर, मार्स सेंड पाइपर प्रजाति की चिडिय़ा भी नजर आई। मूलत: प्रवासी प्रजाति की यह चिडिय़ा भी लंबी यात्रा के दौरान सुस्ताने तथा ऊर्जा के संचय के लिए किसी दलदल जैसी जगह में रूकती हैं ताकि उन्हें पानी मिल सके और कीड़े भी मिल सके।

शिकारियों, फोटोग्राफरों की दुश्मन मानी जाती है लैप्विंग- भारत के प्रख्यात पक्षी विज्ञानी सालिम अली ने तथा मैन इटर आफ कुमाऊँ जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक जिम कार्बेट ने विस्तार से अपनी पुस्तक में लैप्विंग का जिक्र किया है। यह अपने अंडे खुले मैदान में देती है और चौकस निगाहों से अंडों का ध्यान रखती है।

कोई पास आ जाता है तो शोर मचाने लगती है। यह छोटी सी चिडिय़ा शेर को भी शिकार के लिए तकलीफ में डाल देती है क्योंकि घास के मैदानों में जब शेर छिपकर चतुराई से शिकार के लिए आगे बढ़ता है तो यह सजग टिटहरी टी, टी का शोर मचाना शुरू कर देती है और शिकार भाग जाता है। लैप्विंग के टी, टी की आवाज अंग्रेजी के व्हाय डू यू डू ईट की तरह सुनाई पड़ता है। शायद वो व्यवधान नहीं चाहने वाली चिडिय़ा हो जिससे फोटोग्राफरों को भी अच्छे एंगल की वन्य जीवन की फोटो नहीं मिल पाती।

- घनश्याम दास वैष्णव वैरागी

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