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Read latest updates about "सोशल चौपाल" - Page 5

  • मुद्दा: सचमुच हमें डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ आंदोलन खड़ा करना चाहिए

    विगत दिनों गांधीनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से डेटा के औपनिवेशीकरण के खिलाफ कदम उठाने का आग्रह किया। सचमुच मुकेश अंबानी दूरदृष्टा हैं। उन्हें समझ है कि आने वाले समय में दुनिया सूचना तकनीक और सूचना के तेल से चलने वाली है। वैसे भी...

  • राजनीति: क्या महागठबंधन तय करेगा देश की दिशा?

    आज कल देश के सभी छोटे बड़े टेलीविजन चैनलों पर हो हल्ला होता हुआ दिखायी दे रहा है जो चुनावी मौसम के अनुसार आम बात है क्योंकि देश का वातावरण चुनावी मौसम में परिवर्तित हो रहा है। देश की लगभग सभी छोटी बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ अपनी चुनावी जमीन तैयार करने में लगी हुई हैं। सभी छोटी बड़ी पार्टियाँ अपने...

  • राजनीति: उ.प्र. गठबंधन-कांग्रेस के सपनों को पलीता

    केंद्र में सरकार बनाने में सबसे महती भूमिका निभाने वाले उ.प्र. में अंतत: सपा बसपा में गठबंधन हो ही गया। यूं तो यह गठबंधन कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है किन्तु इसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर विरोधी दलों का महा गठबंधन बना कर भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति से उखाड़ फेंकने का जो सपना...

  • राजनीति: सुर्खियां पाने वाले राहुल को साथी नहीं मिल रहे

    राहुल गांधी जो भी बोलते हैं, जहां भी बोलते हैं, उसे इलेक्ट्रानिक एवं प्रिंट मीडिया में सुर्खियां खूब मिलती हैं किंतु सुर्खियां पाने एवं बटोरने के बाद भी उन्हें साथी नहीं मिल रहे हैं। उनको साथ देने वाले या उनकी बातों को आगे बढ़ाने वाले नेता नहीं मिल रहे हैं। यही राहुल गांधी के साथ विवशता है, विडंबना...

  • राजनीति: सवर्ण आरक्षण की राजनीति

    जहर में डूबे कुछ लोग पूछ रहे हैं कि अगर सामान्य वर्ग के लोगों को दस परसेंट आरक्षण देना ही था तो पहले ही क्यों नहीं दिया ? यह चलते-चलते देने का क्या मतलब ? यह सवाल वैसे ही है जैसे किसी की शादी में बैंड बजने लगे तो आप पूछें कि भैया , शादी तो बहुत पहले ही तय हो गई थी , बैंड आज क्यों बजा रहे हो , पहले...

  • मुद्दा: कश्मीर में सेना, यूपी में पुलिस पर पत्थरबाजी?

    लोकतंत्र में हमारे अधिकार हिंसक क्यों बन रहे हैं। हम संविधान उसके विधान और व्यवस्था को हाथ में लेकर खुद न्यायी क्यों बनना चाहते हैं। संविधान में लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रखने की पूरी आजादी है। हर वे व्यक्ति, संस्था, समूह, दल और संगठन अपनी बात वैचारिक रुप से रख सकता है। यह लोकतांत्रिक तरीके से...

  • राजनीति: क्या कमलनाथ कांग्रेस की लुटिया डुबोना चाह रहे हैं?

    कहते हैं चोर, चोरी छोड़ देता है लेकिन सीनाजोरी नहीं छोड़ता। यह बात कुछ नेताओं के संदर्भ में बेझिझक कही जा सकती है। पिछले दिनों हिन्दी भाषी तीन राज्यों छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा की हार हुई। छत्तीसगढ़ में जहाँ कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला तो राजस्थान में बहुमत से कुछ दूर रहे...

  • राजनीति: ओवर कान्फिडेंस के रथ पर अखिलेश-मायावती

    हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों ने जहां विपक्ष को ऊर्जा दी है वहीं कुछ विपक्षी पार्टियां ऐसी भी हैं, जिनके माथे पर इससे शिकन भी आई है। हिंदी हार्टलैंड के 3 राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणामों में कांग्रेस के सरकार गठन के बाद यूपी की विपक्षी-राजनीति कुछ इसी कारण से उलझ...

  • विश्लेषण: मोदी जी जरा संभलना.......

    राजनीति में समय कभी भी एक समान नहीं होता है। आज से चार बरस पहले मोदी की जो लहर दिखाई दे रही थी अब वह हवा वैसी नहीं रही है। 2019 आते -आते मोदी को किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ेगा, वह भी इससे अनभिज्ञ हैं। हाल के दिनों में मोदी सरकार को लेकर सहयोगी दलों में गठबंधन को लेकर जो स्थिति निर्मित हुई...

  • बहस: मराठों को आरक्षण की पहल

    आखिरकार एक लंबे संघर्ष के बाद महाराष्ट्र में मराठाओं ने आरक्षण पाने का रास्ता बना ही लिया। राज्य की फडणवीस सरकार ने मराठों के आरक्षण को लेकर बीते दिनों विधानसभा के पटल पर प्रस्ताव रखा और कुछ ही देर में यह बिल पास भी कर दिया गया। इस फैसले के जरिए बीजेपी सरकार ने साबित कर दिया है कि किसी खास समुदाय को...

  • राजनीति: बिहार में नए राजनीतिक समीकरण की सुगबुगाहट

    इन दिनों बिहार की राजनीति में जबरदस्त गहमा-गहमी है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के तीन घटक दल आपस में भी उलझे हुए हैं। मसलन राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता एवं नरेन्द्र मोदी सरकार के केन्द्रीय राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा लगातार हमलावर रूख अपनाए हुए हैं हालांकि वे भारतीय जनता पार्टी...

  • विश्लेषण: गंभीर होती नक्सलवाद की चुनौती

    नक्सली हिंसा किसी भी स्तर पर आतंकवाद से कम नहीं है। साठ के दशक में आदिवासियों और भूमिहीन किसानों के लिए यह आंदोलन शुरू किया गया होगा लेकिन वे खाली हाथ जमातें आज भी भूमि और जंगलात के अधिकारों के लिए दिल्ली की ओर देखती हैं। नक्सलवाद ने आदिवासियों को हथियारबंद हमलावर तो बना दिया लेकिन गरीब आदमी...

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