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प्रश्न चिन्ह: वेश्यावृत्ति संशोधन कानून से क्या लाभ हुआ?

प्रश्न चिन्ह: वेश्यावृत्ति संशोधन कानून से क्या लाभ हुआ?

वेश्यावृत्ति संशोधन कानून भ्रष्ट अफसरशाही हेतु कानून की आड़ में पैसा बनाने का एक और जरिया है। वेश्यावृत्ति संशोधन कानून की सिफारिशों के मुताबिक अब अगर कोई व्यक्ति वेश्यालय जाएगा तो उसे पचास हजार रूपए तक जुर्माना और सजा हो सकती है।

मंत्रियों के समूह ने 2008 में हुई बैठक में अनैतिक मानव तस्करी रोकथाम कानून में संसोधन को मंजूरी दी। कहा गया कि यह संसोधन गत दो साल से लंबित पड़ा था। संसोधन के तहत वेश्यालय जाने वालों को जेल जाने के साथ ही भारी जुर्माने का प्रावधान भी है। अब तक वेश्यालय जाने वाले पुरूष कानून के शिकंजे से बाहर थे। वेश्यावृत्ति करने वाली लड़कियां ही पकड़ी जाती थीं। इस बारे में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2006 में संसद में विधेयक पेश किया था। मंत्रालय का मकसद है कि महिलाओं को इस गंदे पेशे से मुक्ति दिलाई जाए। सिफारिश में यह कहा जाना कि पुलिस की धर-पकड़ में सिर्फ वेश्यावृत्ति करने वाली लड़कियां ही पकड़ी जाती हैं, पुरूष नहीं काबिले तारीफ है लेकिन कानून बन जाने के बाद इस बात की क्या गारंटी है कि पुलिस पुरूष को पकड़ेगी ?

मंत्रियों के समूह ने जेल की सजा व जुर्माने के प्रावधान को तुरंत ही मंजूरी इसलिए दे दी थी कि वेश्यालय जाने वालों को भी सजा मिलनी चाहिए। सिफारिशों में प्रावधान है कि वेश्यालय जाने का दोषी पाए जाने पर तीन महीने की कैद या बीस हजार रूपए जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं। अगर वह व्यक्ति इस अपराध को दोहराएगा तो उसे 6 माह की जेल या पचास हजार रूपए जुर्माना देना होगा।

दरअसल, ऐसे कानून को व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। हमारे देश में पहले से ही ऐसे कई कानून बने हैं जो फिजूल साबित हो रहे हैं। जो केवल भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हाथ धोने वाली अफसरशाही के लिए ही कल्याणकारी साबित हो रहे हैं। महिलाओं के विकास, कल्याण व सुरक्षा के लिए कई कानून बने हैं पर ज्यादातर फायदे कम, नुकसान अधिक वाले सिद्ध हो रहे हैं। हिंदू विवाह कानून, दहेज, कार्य स्थलों पर यौन शोषण संबंधी कानूनों से समाज में महिलाओं का भला नहीं दिखाई दे रहा है। महिलाओं का घर बिगाडऩे और नुकसान पहुंचाने वाली मिसालें ही सामने आ रही हैं। कानूनों के दुरूपयोग की बात नई नहीं है। विवाह, दहेज, यौन शोषण, बालश्रम, धूम्रपान से संबंधित कानूनों की तो जमकर धज्जियां उड़ रही हैं।

पहले से बना वेश्यावृत्ति कानून महिलाओं का शोषण रोक नहीं पाया है। अब संशोधन के जरिए कानून के शिकंजे में पुरूषों को फंसाने के बाद भी हालत वही रहेगी, यह तय है क्योंकि वेश्यावृत्ति रोकथाम का जिम्मा जिस विभाग के पास है वह भ्रष्टों का भ्रष्टतम यानी पुलिस विभाग है। पुलिस की 'कार्यकुशलताÓ के बारे में सभी जानते हैं। इस विभाग का वेश्यावृत्ति वाले इलाकों से बाकायदा महीना बंधा होता है। अड्डों की मुखिया, दलालों से उसका गहरा रिश्ता होता है।

दिल्ली का जीबी रोड, मुंबई का कमाठीपुरा, हैदराबाद का महबूब की मेहंदी, कोलकाता का सोनागाछी, लखनऊ, पटना, आगरा आदि की देह मंडियां आज इस बात की जीती-जागती मिसाल हैं कि देश भर के रेडलाइट इलाके बंद होने के बजाय खूब फल-फूल रहे हैं। यही नहीं, नए इलाके विकसित हो गए हैं। बड़े शहरों में तो पॉश इलाकों से लेकर मध्यम कालोनियों तक कालगल्र्स के अड्डे आबाद हो गए हैं। इंटरनेट व अखबारों में एस्कोर्ट सर्विसेज और मसाज सर्विसेज के नाम से खुलेआम वेश्यावृत्ति के विज्ञापन छापे जा रहे हैं जिनके बारे में प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदे हंै। देशी-विदेशी हर तरह की सस्ती-महंगी वेश्याएं जब चाहो एक फोन काल पर हाजिर हैं।

देश में देह मंडी में करीब दस लाख महिलाएं बताई जाती हैं। यह तादाद मौजूदा रोकथाम कानून और कई स्वयं सेवी संस्थाओं के प्रयासों के बावजूद दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रही है। दरअसल, समाज में वेश्यावृत्ति कभी खत्म नहीं हो सकती। वेश्यावृत्ति का धंधा उतना ही पुराना माना जाता है, जितना धर्म का धंधा। जब से समाज नामक संस्था का निर्माण हुआ है, तभी से स्त्री और पुरूष दोनों को देह की भूख मिटाने के लिए एकदूसरे की जरूरत महसूस हुई। प्राचीन काल से वेश्यावृत्ति को एक तरह से अघोषित सामाजिक मान्यता मिली हुई है। धर्म ने इस मान्यता को और पुष्ट किया है। आज तो संचार युग में इस धंधे की राह और आसान हो गई है। अखबार, टेलीफोन, इंटरनेट आदि के माध्यम से जरूरत मंदों की तलाश पूरी हो रही है। सेक्स का धंधा अब एक बड़े उद्योग के रूप में विकसित हो गया है। पेशा ग्लोबल हो चुका है। शौकीनों को हर देश, प्रांत के जिंदा गोश्त का टेस्ट चंद लम्हों में उपलब्ध कराने वाले सेवा में हाजिर हैं।

लेकिन सवाल यह है कि कोई महिला इच्छा से अपना पेट भरने या पैसे के बदले अगर अपना जिस्म किसी को सौंपती है तो गलत क्या है? यह दुख की बात है कि जो समाज और सरकारें औरत को इस पेशे में जाने की मूल समस्याओं को खत्म नहीं कर पा रही हैं, उसे इनके धंधे पर अंकुश लगाने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए। औरतों के कल्याण के नाम पर ऐसे कानून थोपे जाने से वेश्याओं का भला नहीं होगा।

ऐसा कोई भी कानून लाने से पूर्व जरूरी है कि इस पेशे से जुड़ी महिलाओं के पुनर्वास के लिए भी सरकार कोई पुख्ता इंतजाम करे। अगर कानून लागू होता है तो इस धंधे से जुड़ी लाखों औरतें जो काम अब खुलेआम करती हैं, वह चोरी-छिपे करेंगी। लोग रात के अंधेरे में अपनी और धंधे में लिप्त महिलाओं की रातें गुलजार करेंगे। फायदा किसी भी हालत में औरतों को नहीं होगा। सरकार जो चाहती है, वह नहीं हो पाएगा। फायदा अगर किसी को होगा तो इस देश की भ्रष्ट अफसरशाही को।

दुनिया के कुछ देशों में वेश्यावृत्ति को सरकारी मान्यता मिली हुई है। औरतों के कल्याण, नैतिकता और संस्कृति के नाम की दुहाई देकर चोरी को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। असल में हर नया कानून देश में भ्रष्टाचार के एक नए नाले के रूप में बनता है जिसमें केवल गंदगी के अलावा सुधार या सफाई कहीं नजर नहीं आती। वेश्यावृत्ति पर अगर संशोधित कानून लागू होता है तो कानूनों की लंबी फेहरिश्त में एक और बेमतलब का कानून शामिल हो जाएगा। इस कानून का हश्र भी वही होगा जो दूसरों का हो रहा है। भ्रष्टाचार का एक और जरिया भ्रष्टों के हाथ लग जाएगा।

वेश्यावृत्ति निवारण कानून केवल कागजी शेर है। पुलिस दिखावे के लिए कभी-कभी छापा मारती है। पकड़ी गई वेश्याओं को अदालत में पेश किया जाता है। पांच-सात दिन में जमानत हो जाती है और वेश्याएं फिर से अपने धंधे में बदस्तूर लग जाती हैं। नाम बदल दिए जाते हैं, ठिकाने बदल दिए जाते हैं।

-नरेंद्र देवांगन

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