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यदि पति को किसी और से प्यार हो जाए?

यदि पति को किसी और से प्यार हो जाए?

जिसे हम प्यार करते हैं, जिसके नाम हमने पूरा जीवन निभाने की ही नहीं बल्कि सात जन्मों तक साथ देने की कसम खाई है, वह अगर हमें प्यार न करे और हमारे हिस्से का प्यार किसी और पर लुटा दे तो इससे बड़ा दर्द किसी औरत के लिए शायद ही कोई और हो सकता है। संसार की कोई भी स्त्री कितनी ही उदार हृदय क्यों न हो पर किसी पुरूष विशेषकर अपने पति द्वारा खुद को छले जाने की स्थिति के लिए किसी को क्षमा नहीं कर सकती।

पति के जीवन में प्रेमिका शादी के फौरन बाद नहीं आती। यह नयी प्रेमिका कई वर्षों बाद दबे पांव आकर गृहस्थी में आग लगाने पहुंचती है। शादी के कितने वर्षों बाद वह आ जाएगी, उसकी कोई समय सीमा तय नहीं होती। हो सकता है कि यह तूफान पांच छ: बरस बाद आए या फिर बीस पच्चीस वर्ष बाद।

उम्र के उस दौर में जब पति पत्नी को साथ बैठकर बच्चों के भविष्य की फ्रिक करनी हो, उस उम्र में पुरूष अपने सफेद हुए बालों को रंग, रंगीन शर्ट पहन, रंगीन मिजाज बने घर से बाहर निकलने लगे, धीरे-धीरे सीढिय़ां चढऩे की उम्र में तेज गति से घर की सीढिय़ां उतरने लगे, बच्चों की शादी नौकरी की फ्रिक छोड़, पत्नी की बीमारी की चिंता छोड़, प्रेमिका के लिए नए अंदाज के सैंडिल खरीदना शुरू कर दे तो किस पत्नी का माथा नहीं ठनकेगा।

उम्र के किसी भी मोड़ पर पहुंचकर जब पति अपनी प्रेमिका के साथ नयी गृहस्थी बसाने का एलान कर दे तो पत्नी क्या करे? यह बड़ा ही कठिन सवाल है और इस सवाल का कोई उत्तर नहीं हो सकता।

दिल के हाथों ऐसी भी कैसी मजबूरी कि लोकलाज का कोई विचार नहीं, बच्चों की कोई फ्रिक नहीं। बीस बाईस वर्षों तक साथ रहने वाली पत्नी को मानसिक रूप से आहत कर देना भला कैसा इंसाफ है। महिलाओं के लिए बनी विशेष कोर्ट कचहरियों में दूसरी औरत कर लेने का रोना रोने पहुंची औरतों की उम्र की कोई सीमा नहीं होती, न ही कोई आयु वर्ग या पढ़ाई लिखाई का सवाल। गरीब से गरीब और अमीर से अमीर, अनपढ़ और बड़ी-बड़ी डिग्रियां, बड़े-बड़े ओहदे पर पहुंची सभी इस परेशानी से आहत इंसाफ की गुहार के लिए पहुंचती हैं।

अक्सर औरत को ही थोड़ी समझदारी, थोड़ा धैर्य रखने का उपदेश दिया जाता है। लोकलाज, बच्चों की परवरिश और इस उम्र में कहां जाएगी, मायके जाना समस्या का हल नहीं होता आदि कारणों से वह सभी कुछ सहने या पति के लौटने का इंतजार करने के लिए मजबूर रहती है।

इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि अक्सर पति के किसी दूसरी स्त्री के साथ प्रेम प्रसंगों की जिम्मेदार पत्नी को माना गया है। उसी पर आरोप लगाया जाता है कि उसके व्यवहार में आयी कुछ कमी के कारण ही तो पति दूसरी औरत की ओर आकर्षित हुआ है। उसे ही पति की प्रेमिका को सहज रूप से लेने की हिदायतें दी जाती हैं।

पर क्या ऐसे में पत्नी की स्थिति सहज हो सकती है। वह तो एक ठगी गयी पत्नी होती है। एक दूसरी स्त्री की उपस्थिति पति पत्नी को एक दूसरे से कितना दूर कर देती है, उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। दोनों के बीच सात समुद्रों की दूरी आ जाती है। भले ही दुनिया की नजरों में वे अब भी पति पत्नी होते हैं। शरीर से पास रहते हुए भी कोई व्यक्ति मन से कोसों दूर कैसे हो जाता है, यह वही औरत जान पाती है जिसने इस यथार्थ को भोगा होता है।

आखिर औरत से क्यों कोई यह उम्मीद करता है कि मक्कार और बेवफा पति से, विवाह के पवित्र बंधन को पैरों तले रौंदने वाले पति से भी पत्नी प्रेम करे। क्या उसका मन नहीं होता? क्या उसका कोई स्वाभिमान या कोई आत्मसम्मान नहीं होता? क्या उसे कोई अधिकार नहीं होता? पति सुख से वंचित होना उसकी नियति क्यों हो? क्या यह साथ वो सिर्फ समाज के डर से निभाती रहे? ऐसे रिश्ते में कैसा सुख? कैसा साथ? हर चीज का बंटवारा? स्त्री सब कुछ बांट सकती है पर पति नहीं। पति का प्रेम किसी दूसरे के साथ नहीं बांटा जा सकता। क्या प्यार भरे लम्हों को सौतन को सहेली या छोटी बहन मान कर बांटा जा सकता है।

स्त्री पुरूष के प्रेम संबंधों में किसी तीसरे के आ जाने से घृणा ही उत्पन्न होती है। औरत तो अपने प्यार को, बचपन के साथी को, कॉलेज के संगी साथी की यादों को अग्नि के सात फेरे लगाते लगाते अग्नि में स्वाह कर अपने पति की अर्द्धांगिनी बन अपना अतीत बिसरा देती है पर पति क्यों कभी शादी से पहले की प्रेमिका तो कभी नयी प्रेमिका को अपने जीवन में अपना अभिन्न अंग बनाये रखता है।

जिसकी बांह विवाह मंडप में पकड़े, उसे ताउम्र निभाने का वचन सिर्फ अग्नि के फेरे लेने तक ही सीमित न रख उम्र भर निबाहे, यही कोशिश की जानी चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं, केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है वह तो स्त्री की आसक्ति मात्र है जिसकी कोई उम्र नहीं होती।

प्रेम में विश्वास का महत्व है। प्रेम बहुत सहन करता है पर उसमें द्वेष की गुंजाइश नहीं होती। समाज में जिसे गौरव प्रदान नहीं किया जा सकता, उसे केवल प्रेम द्वारा सुखी नहीं किया जा सकता। मर्यादाहीन प्रेम का भार शिथिल होते ही दुस्सह हो जाता है। वैवाहिक जीवन में प्रेमिका का आगमन मर्यादाहीन प्रेम का पर्याय है। ऐसे प्रेमी प्रेमिका को समाज में स्वीकारा नहीं जाता। जमाने की हमें परवाह नहीं कह कर भले ही वर्तमान में अपने को बहलाया जा सकता है पर ऐसे संबंधों की उम्र न तो लम्बी होती है और न ही भविष्य उज्ज्वल।

पति पर शक कब करें

- जब दौरे का सूटकेस अक्सर तैयार रहने लगे।

- जब उनका मूड बदला बदला रहने लगे।

- जब पति महोदय घर से बाहर निकलने के बहाने ढूंढने लगें।

- जब देर से लौटने की सफाई वे स्वयं ही देने लगें।

- जब वे घर के काम काज और जिम्मेदारियों से जी चुराने लगें।

- जब वे कुछ ज्यादा ही रोमांटिक रहने लगें।

- एम. कृष्णा राव 'राज

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