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बेटी से बहू तक

बेटी से बहू तक

बेटी, बेटी ही बनी रहे, वह बहू न बने तो इस संसार का क्या होगा? बेटी से बहू न बनने पर स्त्री होने का अर्थ क्या होगा? स्त्री होने का अर्थ है सृजन। यह सारा संसार उसी सृजन की उपलब्धि है, इसलिए बेटी से बहू बनना सामाजिक आवश्यकता है, वैज्ञानिक अनिवार्यता है, मानव समाज के विकास की एक शर्त है। ये सारे नाते-रिश्ते प्रकट होते हैं-बेटी के बहू बनने के बाद।

बेटी के समय के रिश्ते गमले में लगाए फूल के समान हैं। गमले के फूल सुन्दर होते हैं मगर वह फूलों का पार्क नहीं बन सकता। गमला-गमला है, फूलों का बगीचा नहीं। बेटी से बहू बनना नारीत्व का विस्तार है। स्त्री शक्ति का विराट रूप उससे प्रकट होता है इसलिए बहू का जो दायित्व है, वह समस्त नारीत्व के व्यक्तित्व और मर्यादा को प्रकट करने का एक सामाजिक संबंध है।

वह मां, भाभी, चाची, दादी, नानी, बनकर मानव के वंशवृक्ष की वृद्धि करती है। भगवान को भी अर्द्ध नारीश्वर रूप धारण कर यह साबित करना पड़ा कि मनुष्य और देवता तो क्या, नारी के बिना ईश्वर भी अधूरा है। लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती, ये तीन महादेवियां, महाशक्तियां हैं। इन तीनों के बिना ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अधूरे हैं।

तीन शक्तियां हैं, धन शक्ति, विद्या शक्ति और शस्त्र शक्ति। इन तीनों शक्तियों की अधिष्ठात्री देवियां हैं-लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा, इसलिए बहू बनना नारी के सर्वश्रेष्ठ रूप का प्रतीक है। वह इसी रूप में अपनी महान मातृशक्ति प्रकट करती है, इसलिए बहू के सामने बहुत सी मर्यादाएं हैं। विवाह के बाद, स्त्री, बहू के रूप में एक पराए घर में प्रवेश करती है इसलिए बहू को यह समझना चाहिए कि पत्नी की भूमिका के पहले बहू की भूमिका निभाना, उस का कर्तव्य है।

सास-ससुर तो यही चाहते हैं कि उनके घर बहू आए और वह उनके बुढ़ापे का सहारा बने। उनको मान-सम्मान दे। सास-ससुर जो कुछ अर्जन करते हैं, वह सब तो बहू-बेटे के ही तो हैं। इसलिए जिस घर में बहू-सास की सेवा करती है, अतिथियों का सत्कार करती है, नाते-रिश्तेदारों को समुचित सम्मान देती है, उसी घर में बहू को गृहलक्ष्मी कहा जाता है। बहू को गृहलक्ष्मी का सम्मान प्राप्त होना, भारत रत्न, पद्मश्री अथवा नोबल पुरस्कार से बड़ा पुरस्कार है। घर में कोई मेहमान आए और सास-ससुर को इतनी भी हिम्मत न हो कि बहू को कह सकें कि जरा एक चाय बनाकर ले आ बेटा तो समझिए, वह घर भरा पूरा होने पर भी नरक है।

सास-ससुर को भी अपनी बहू को अपने प्राण से भी अधिक प्यार देना चाहिए। प्रेम में लेन-देन नहीं होता, त्याग और उत्सर्ग होता है। सास-ससुर को भी अपना सम्पूर्ण प्यार बहू को देना होगा मगर जरूरी है कि बहू अपने सास-ससुर को यह विश्वास जरूर दिलाए कि वह उनकी बेटी है, उनकी कभी उपेक्षा नहीं करेगी। सास ससुर का विश्वास और प्रेम जिस दिन बहू को प्राप्त हो जाता है, उस दिन से घर में बहू गृहलक्ष्मी बन जाती है और जहां लक्ष्मी स्वयं विराजमान हो, वहां सुखों का अभाव कैसे होगा।

-ज्योत्सना निधि

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