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कैरियर की ज्वाला में भस्म होता दांपत्य सुख

कैरियर की ज्वाला में भस्म होता दांपत्य सुख

आज का दांपत्य जीवन अधिकांशत: परेशानियों के घेरे में घिरा नजर आता है। कुछ दशक पूर्व तक जब औरतें घर-परिवार के काम तक ही सीमित रहा करती थीं, उनकी जिम्मेदारियां परिवार तक ही केंद्रित रहा करती थीं। तब उनके दांपत्य जीवन में इतने संघर्ष नहीं हुआ करते थे जितने आज होते हैं।

उस समय महिलाओं के जिम्मे सिर्फ घरेलू काम काज हुआ करते थे जिन्हें सुव्यवस्थित ढंग से वे संभाला करती थीं और पुरूष बाहर का काम देखा करते थे परन्तु आज की महिलायें पढ़-लिखकर बड़े-बड़े पदों तक जा पहुंची हैं और घरेलू काम-काज का जिम्मा आया या नौकरों पर छोड़ चुकी हैं या फिर उन्हें ही घर पर आकर घरेलू कामों को भी संभालना पड़ता है। इस दोहरे कार्यभार से वे तनावग्रस्त हो जाती हैं। इसी तनावग्रस्तता के कारण उनके दांपत्य जीवन में दरारें आने लगती हैं।

आधुनिकाओं का दृष्टिकोण पुरूषों के प्रति बदलने लगा है और उनमें अपेक्षाओं का ज्वार पनपने लगा है। आज पति-पत्नी के बीच घरेलू काम-काज और बच्चों की छोटी-मोटी जिम्मेदारियों से लेकर घर के खर्च और प्रबंध के सारे मुद्दे सिर्फ अधिकारों के ही नहीं बल्कि अहंकारों के टकराने के क्षेत्र बन गए हैं। किसी भी बात को लेकर कभी-भी शीत युद्ध और हाथा-पाई से लेकर अदालतों तक पहुंचने की नौबतें आ जाती हैं। इन सब झगड़े विवादों के बीच आज के दंपति उलझने लगे हैं और उनके जीवन प्रेम विहीन होते जा रहे हैं।

पति-पत्नी के संबंधों की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वे कितना समय साथ-साथ बिताते हैं। ज्यादा अलग-अलग रहने से न तो एक-दूसरे को ही समझने का मौका मिलता है और न ही एक-दूसरे के लिए सम्पूर्ण प्यार ही अभिव्यक्त किया जा सकता है। आजकल पति-पत्नी दोनों ही अपने-अपने कैरियर के पीछे लगे हुए हैं और उन्हें सिर्फ आगे बढ़ते जाने की धुन सवार है। उन्हें एक-दूसरे के लिए कम ही समय मिल पाता है।

आज लोग सिर्फ नौकरियां ही नहीं करते बल्कि कैरियर बनाने के चक्कर में उन्हें सिर्फ वही धुन सवार रहती है कि दिन-प्रतिदिन कैसे आगे बढ़ा जाए? कुछ समय पहले तक अधिकांश कामकाजी महिलाएं उन पंछियों की तरह थीं जो उड़ कहीं भी रही हों पर उनका मन हमेशा अपने घोंसले रूपी घर पर ही लगा रहता था। आज प्रतिस्पर्धा के दौर में जहां हर किसी को पिछडऩे और असफल होने का खतरा बना रहता है, वहीं उनका अपना दांपत्य सुख पिछड़ता चला जाता है। कैरियर में अपना सुख-चैन गंवा देना उनके कैरियर की मजबूरी बनती जा रही है।

आज का पति भी पहले के पतियों की तरह अधिकतर यही चाहता है कि जब वह थका-मांदा बाहर से घर लौटे तो पत्नी उसकी आवभगत के लिए आंखें बिछाए इंतजार कर रही हो और आते ही प्यार भरे तरीकों के साथ चाय-नाश्ते के प्रबंध के साथ हाजिर हो परन्तु आज यह संभव नहीं है क्योंकि पत्नी भी तो संपूर्ण दिन काम करके थक कर ही घर लौटती है।

आज की महिलाओं की प्राथमिकता में परिवर्तन आने लगा है। अब तमाम महिलाएं घर की जिम्मेदारियों में उलझने की बजाए अपने कैरियर के विकास पर ध्यान देने लगी हैं। वे अब अपना संतोष घर के लोगों की संतुष्टि में नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति में ढूंढने लगी हैं। इस तरह औरतों के अच्छी नौकरी पा जाने, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से स्वतंत्र हो जाने के कारण पुरूष भावनात्मक असुरक्षा महसूस करने लगे हैं।

आज के पतियों को लगने लगा है कि उनकी पत्नी कभी भी उन्हें छोड़कर जा सकती है। अब वे वैवाहिक संबंधों की गारंटी के रूप में बच्चे की ज्यादा कामना करने लगे हैं। अब जब कभी बच्चे को लेकर विवाद हो यानी पति बच्चा चाहे और पत्नी न चाहे तो इस बहस की चर्चा एक महाभारत का रूप धारण करने लगती है।

कामकाजी महिलाओं की एक बड़ी समस्या यह भी रही है कि दिनभर नौकरी करने के बाद घर का काम भी उन्हें ही करना पड़ता है। बढ़ते हुए काम, जीवनसाथी और परिवार के सदस्यों के सहयोग न मिलने से ऐसे घरों में तनाव की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है। वैवाहिक सलाहकारों का कहना है कि आजकल अधिकांश पति घर के कामों में सहयोग नहीं करते या फिर जो करते हैं, उनके काम उनकी पत्नियों को पसंद नहीं आते। दोनों में तनाव का यह भी एक कारण होता है।

कैरियर के चक्कर में जहां महिलाओं का सामाजिक दायरा बढ़ रहा है, वहीं उनके पुरूष और महिला मित्रों की संख्या भी बढ़ रही है। इन दोस्तों के साथ उनका संबंध कई बार इतना गहरा हो जाता है कि उनका जीवनसाथी अपने आपको उपेक्षित सा महसूस करने लगता है और यह संबंधों के टूटने का कारण बन जाता है। यह सच है कि बाहरी जीवन में दोस्त बहुत काम आते हैं लेकिन संबंधों की ऊंचाइयों के क्र म में सामाजिक संबंध पारिवारिक संबंधों से नीचे आते हैं। संबंधों की इन सीमाओं का पालन करने से ही दांपत्य जीवन सुखमय बना रहता है।

जीवन साथी की ज्यादा उपेक्षा से और दोस्तों के बीच अधिक बैठने-उठने से जीवनसाथी में ईर्ष्या बढऩे लगती है और तरह-तरह की शंकाएं घर करने लगती हैं। दांपत्य जीवन अर्थविहीन भी लगने लगता है।

पुरूष जैसा कार्य करने से महिलाओं में ढेर सारे वही गुण-दुर्गुण आने लगते हैं जो आज तक पुरूषों के ही क्षेत्र में आते थे। बात-बात पर पतियों पर हुकुम चलाना, पति के समान ही शराब या सिगरेट का इस्तेमाल करना, व्यवहार में आक्र ामक नजरिया लाना आदि आदतें महिलाओं में घर करने लग गई हैं।

कैरियर की तरफ ध्यान देना बुरी बात नहीं है परन्तु कैरियर के साथ ही दांपत्य जीवन को खुशहाल रखना भी जीवन का एक उद्देश्य होता है जिसे पति-पत्नी दोनों ही आपसी समझ-बूझ से बनाए रख सकते हैं।

- पूनम दिनकर

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