Top

अपनी ही न हांकते रहें

अपनी ही न हांकते रहें

हमारे जीवन की यह एक दुखद बात है कि कई लोग जबरन खामोशी ओढ़ लेते हैं, इसलिए कि वे कुछ शर्मीले व इन्ट्रोवर्ट किस्म के होते हैं। उन्हें बोलने के लिए थोड़ा प्रोत्साहन चाहिए। फिर वे भी धाराप्रवाह बोल सकते हैं लेकिन अब ऐसे लोगों को क्या कहें जो सिर्फ अपनी ही हांकना जानते हैं। दूसरे की बात पर वे जरा भी तवज्जो नहीं देते, न उन्हें जरा भी बोलने का मौका देते हैं।

वे नहीं जानते इस तरह वे कई बार अपना कितना नुकसान कर बैठते हैं। हो सकता है दूसरे के पास जानकारियों का भंडार हो, ज्ञान के मोती हों।

कई लोग खुशी से दूसरों की बातें सुनते हैं। हो सकता है उनमें हीनता बोध प्रबल हो, अपने पर विश्वास ही न हो कि वे भी सामने वाले के सामने कुछ बोल सकते हैं। ऐसा तब होता है जब वे बोलने वाले से बेहद प्रभावित होते हैं। कई बार अपनी कमी पर पर्दा डालने के लिए वे कहते हैं 'भई हम तो अच्छे श्रोता हैं, और सुनना भी तो एक कला है।'

सुनने वाले कुछ मायने में तो बड़े फायदे में रहते हैं। अगर वे बहुत सीक्रेटिव किस्म के हैं तो अपना कोई भी भेद बताने के रिस्क से बच जाते हैं और हांकने वाला अपनी रौ में अपने ही कई न बताने वाले भेद खोल देता है। ज्यादा बोलने वालों की ऊर्जा नष्ट होती है। चुप रहने वाले इसे बचा ले जाते हैं।

दरअसल यह 'बैड मैनर्स' में आता है कि आप दूसरे की बात न सुनें, उसे बीच में काट दें या ऐसे दिखायें कि आपको उनकी बात में कोई दिलचस्पी नहीं तो वे ही आप की बात में दिलचस्पी क्यों लें। दरअसल बातूनी लोगों की प्रॉब्लम यह होती है कि उनके मन में ढेर सी उथलपुथल और बेचैनी हो रही होती है कि कब मैं अपना विलंबित राग छेडूं।

दूसरों की बातों में दिलचस्पी लेना सीखें। अच्छी बातों की दिल खोल के प्रशंसा करें। अपने खोल से बाहर निकलें। निस्संदेह अपनी हांकते रहने वाले लोग आत्मकेंद्रित होते हैं। जिन्हें अपने से ही फुर्सत नहीं, वे भला दूसरे की क्या सुनेंगे। उनके व्यक्तित्व का विकास रूक जाता है क्योंकि उसके विकास के मार्ग तो आपने स्वयं इंटरएक्शन रोक कर अवरूद्ध कर लिया है।

अच्छे श्रोता बनकर तो देखिए। फायदे कुछ ही समय में नजर आने लगेंगे। आप दूसरों को सुनें, उसमें मुख्य विचार आत्मसात करें। दूसरों की भावनाओं को भी समझने का प्रयास करें। हर बात अपने पर ही न लें। दूसरा अगर जनरलाइजेशन करके बात कर रहा है तो उसे उसी तरह लें, व्यक्तिगत रूप में न लें। पूर्वाग्रहों से बचें। इससे बात सही रूप में नहीं देख पाऐंंगे। किसी भी बात को बग़ैर सोचे समझे कंडेम न करें।

बॉडी लैंग्वेज से भी बात को जोड़कर देखें, तभी बात पूरी तरह पकड़ पाएंगे समझ पाएंगे। बात को एक ही तरह से न देखें बल्कि दूसरा पक्ष भी देखें। सुनें तो शत प्रतिशत ध्यान से सुनें। एकदम से अभिमत न बना लें, न ही परिणाम पर पहुंचे। ज्ञान सिर्फ किताबों में ही नहीं। हम एक दूसरे से बोल बतिया कर जो प्रैक्टिकल नॉलेज पा सकते हैं, उसकी बात ही कुछ और है।

- उषा जैन 'शीरी'

Share it