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जब पति ही पत्नी पर शंका करे

जब पति ही पत्नी पर शंका करे

शादी से पहले हर लड़की अपने पति के रूप में एक राजकुमार का सपना देखती है। उसी को लेकर ऊंचे-ऊंचे सपनों के महल भी बनाती है। लड़के भी कुछ ऐसी ही कल्पनाओं की दुनिया में विचर रहे होते हैं शादी से पहले। वे सपनों में भी यह बात नहीं सोचते कि उनके महल पर कभी शंका का बम भी गिर के उसे पलभर में ध्वस्त कर सकता है लेकिन अगर देखा जाए तो ऐसे बहुत सारे महल खण्डहर के रूप में मिलेंगे जिन पर ऐसे ही बमों के गिरने की बात वही लोग बताते हैं जिन्होंने बड़े ही जतन से उसे बनाया था।

सुषमा की शादी एक ऐसे लड़के से हुई जो पढ़ा लिखा योग्य, देखने में आकर्षक, अच्छे खानदान से ताल्लुक रखता था। उसके पिता ने शादी से पहले तो 'लाखों में एक है तेरा दूल्हा' कहा था। यह सुनकर सुषमा को बड़ा गर्व हुआ था अपने भाग्य पर परंतु आजकल इन दोनों के बीच की दूरी काफी बढ़ी हुई प्रतीत होती है।

सुषमा का कहना है शादी के बाद कुछ दिन तक हम खुश थे। वे भी मुझे बहुत प्यार करते थे लेकिन कुछ ही दिन बाद उनके प्यार की गागर से जहर छलकने लगा। वे बात-बात पर मेरे ऊपर शंका करने लगे। यहां तक कि अगर मैं कभी मैके भी जाने की बात करती तो बड़े ही कटु भाव से कहते - हां हां, जाओ जाओ, वहां भी तो यार दोस्त इंतजार कर रहे होंगे और फिर चुप हो जाने के अलावा मेरे आगे कोई चारा नहीं बचता।

सुषमा आजकल अपने आप को चारदीवारी में कैद महसूस करने लगी है। अगर कभी कहीं चली जाए तो घर लौटने पर सवालों की आंधी सी आ जाती है। कहां गयी थी? क्यों गयी थी? किससे मिलने गयी थी? इतनी देर तक क्या कर रही थी? वगैरह-वगैरह। सुषमा ने इन सब सवालों का सामना करने से अच्छा घर की चारदीवारी में बंद होना ही समझा और आजकल वह खुद को बाहर की दुनिया से बिलकुल अलग - थलग समझने लगी है।

पति के इस प्रकार के शंकालु व्यवहार से जहां एक तरफ पत्नी का अपनी सखी सहेलियों से मिलना-जुलना बंद हो जाता है, वहीं दूसरी तरफ उस की सेहत पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ता है। किसी भी पति को अपनी पत्नी की जिंदगी में शंका के कांटे नहीं बोने चाहिए। उसकी भी अपनी एक दुनिया होती है, सखी-सहेलियां होती हैं। उनकी भी अपने जीवन की अच्छाई-बुराई सोचने समझने का अपना नजरिया होता है, इसलिए उसे बात-बात पर टोकना और शंका की नजर से देखना ठीक नहीं।

इसका मतलब यह भी नहीं कि उसे मनमानी करने को छोड़ दिया जाए। वह जो कुछ अच्छा-बुरा करे, उसे शिरोधार्य कर लिया जाए। केवल उसके रास्ते में शंका के कांटे नहीं बोने चाहिए लेकिन उसके ऊपर निगरानी की चादर सदैव ओढ़ाए रखनी चाहिए जो उसे पथ विमुख न होने दे और वह खुद को उसके नीचे सुरक्षित समझे।

राकेश अपनी पत्नी विमला को पूर्ण रूप से स्वतंत्र रखने में विश्वास रखते हैं। वे पार्टी वगैरह में तो पत्नी के साथ होते हैं परन्तु उनकी पत्नी नौकरी भी करती है जहां राकेश का साथ-साथ जाना संभव नहीं होता क्योंकि राकेश की भी अपनी नौकरी है। फिर भी राकेश को अपनी पत्नी पर कोई शंका नहीं, कोई शिकायत नहीं। उन्हें विमला पर पूरा विश्वास है।

विमला का कहना है कि मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं। मुझे तो जब कभी कहीं जाना हुआ, इन्होंने खुशी-खुशी जाने दिया पर मैंने अनायास में घूमने का कभी कोई प्रोग्राम नहीं बनाया। जब भी मुझे कहीं घूमने का अथवा पिक्चर देखने का मन हुआ तो इनके साथ ही जाती हूं। विमला को यह कभी नहीं अच्छा लगता कि पति घर में बैठे रहें और वह अकेले घूमने या सामान की खरीदारी करने जाए। उनका कहना है कि हर पत्नी को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसे खुद को एक आदर्श मां, सफल गृहिणी तथा गृहलक्ष्मी बनकर रहना है।

पति-पत्नी उन दो पैरों के समान होते हैं जिनसे इन्सान चलता है। अगर एक पैर जरा सा भी नाजुक हुआ तो आदमी का चलना लंगड़ाने में बदल जाता है। पति को पत्नी पर तथा पत्नी को पति पर पूरा भरोसा रखना चाहिए और एक दूसरे के कदम में कदम मिला के चलना चाहिए जिससे जीवन के कठिन से कठिन रास्ते पर भी चलना आसान सा लगे।

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