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महिलाएं किस्म-किस्म की

महिलाएं किस्म-किस्म की

एक महिला के लिए भी महिलाओं को समझना और उनके बहुपक्षीय व्यक्तित्वों को समझना कठिन है। फिर भी इस लेख के माध्यम से महिलाओं को उनके आचरणों के आधार पर वर्गीकृत किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। महिलाएं मुख्यत: इन सात वर्गों में रखी जा सकती हैं-चंचला, लज्जावती, करूणा, कलहप्रिया, शान्ता, पतिव्रता व कुपिता।
चंचला वर्ग की स्त्रियां स्वभाव से बहुत चंचल होती हैं। ऐसी स्त्री का मन कभी स्थिर नहीं रहता। वह कभी एक सहेली, एक प्रेमी, एक कलाकार-कुल मिलाकर एक व्यक्ति के प्रति समर्पित नहीं रह सकती। वह किसी न किसी कारणवश अपने पूर्व प्रियजनों की आलोचना कर बैठती हैं, फिर नए मित्रों की तलाश शुरू कर देती हैं। चंचला वर्ग की स्त्री अपने माता-पिता व अभिभावकों के लिए सरदर्द बनी रहती हैं।
विवाहिता 'चंचला' स्त्री को वश में रखना उसके पति के लिए कठिन हो जाता है। इस वर्ग की स्त्रियां यहां-वहां घूमना, इससे-उससे बोलना, चुगलखोरी करना नित्य के काम समझती हैं। वे लोगों से बोलते-बोलते इतना अधिक बोलने लगती हैं कि बोलते समय उन्हें छोटे-बड़े, परिचित-अपरिचित, भला-बुरा, उचित-अनुचित आदि का ख्याल ही नहीं रहता। तनाव उत्पन्न करने वाली बातें कर कभी-कभी वे खतरे में फंस जाती हैं।
चंचला वर्ग की स्त्री गृहिणी हो या बच्चों की मां हो, उसके कार्यकलापों पर असर पडऩे वाला नहीं। बच्चों को स्कूल भेजकर, घर के छोटे-मोटे काम निपटाकर वे अपने 'प्रधान कार्य' में जुट जाती हैं। गोद में बच्चा हो तो भी उन्हें कष्ट नहीं। पति की अनुपस्थिति में मिलते-जुलते स्वभाव वाली पड़ोसिनों को घर पर बुला लेती हैं तथा गप्पें हांकती हैं। सिर्फ अशिक्षित या अल्पशिक्षित ही नहीं, शिक्षित महिलाएं भी इस वर्ग में शामिल की जा सकती हैं जिनके पास डिग्रियां तो होती हैं किन्तु करने के लिए काम नहीं होता। चंचला वर्ग की स्त्री की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बहुत जल्द और बहुत आसानी से लोगों से अलग हो जाती हैं। चंचला स्त्री अपने स्वभाव व आचरण को छुपा नहीं सकती।
लज्जावती वर्ग की स्त्रियां अति संवेदनशील होती हैं। उसमें नारी सुलभ लज्जा सीमा पार कर गई अर्थात अति होती है। वास्तव में लज्जा उसके अंदर से नहीं फूटती बल्कि दिखावा होती है। वे चलती हैं तो ऐसा लगता है मानो कोई तिनका हवा में उड़ रहा हो। मुंह की बोली उनके लिए रत्न समान होती है। दूसरों के समक्ष खाना हो तो वे खाने की औपचारिकता मात्र पूरी करती हैं। प्राय: भूखी रह जाती हैं। लज्जावती वर्ग की स्त्रियां हमेशा चेहरे पर मीठी मुस्कान लिए हुई होती हैं और स्वयं को अति सुन्दर समझती हैं। इस तरह की हरकतें कर वे घमण्डी की उपाधि ग्रहण करती हैं।
करूणा वर्ग की स्त्रियों का चेहरा देखकर ही पता किया जा सकता है कि वे उदासी या डिप्रेशन की शिकार हैं। उनकी आंखों में झांकने पर गहरा सागर नजर आता है जो छलकने को तत्पर रहता है मगर इस तरह की उदास स्त्री अपना दुख आसानी से दूसरों को नहीं बताती।
करूणा वर्ग में ऐसी स्त्रियां भी होती हैं जिनके लिए दु:ख का प्रदर्शन स्वार्थ सिद्धि का माध्यम मात्र होता है। ऐसी स्त्रियां रो-धोकर, सर पटक कर, बढ़ा-चढ़ाकर अपनी समस्याओं का बखान कर लोगों से काम बनवा लेती हैं। आंसू बहाकर रुपए ऐंठने, अफसर से एडवांस में रुपए मांग लेने व अपने शत्रु को दूसरों की आंखों में नीचा दिखाकर स्वयं को निर्दोष साबित करने में वह पारंगत होती हैं। दूसरों के गम को मोम की तरह गलाना उसके लिए चुटकी भर का काम होता है।
कलहप्रिया वर्ग की पढ़ी-लिखी स्त्रियां कलह की सृष्टि करने का तरीका सावधानीपूर्वक अपनाती हैं। वे सबसे पहले यह पता लगाती हैं कि उनके शत्रु का निकटतम मित्र कौन है, फिर शत्रु के निकटतम मित्र से स्वयं मित्रता स्थापित कर लेती हैं। फिर शत्रु की एक-एक कमजोरी को मित्र के समक्ष इस प्रकार प्रस्तुत करती हैं मानो इसके पीछे उनका कोई पूर्वाग्रह ही न हो। यदि वे अपने शत्रु को मित्र-विहीन बनाने में या जलाने में सफल हो जाती हैं तो मन ही मन बहुत आनंदित होती हैं किन्तु चेहरे पर प्रतिक्रिया को आने नहीं देती।
कलहप्रिया वर्ग में ऐसी स्त्रियां भी होती हैं जो पति को अपने वश में कर पूरे घर-परिवार में दरारें पैदा कर देती हैं। इस तरह अशान्ति पैदा करने के साथ-साथ गाली-गलौज करना, चीखना-चिल्लाना, रो-धोकर बात मनवाना, जिद करना आदि पारपंरिक तरीके भी वे अपनाती हैं। उनका मन ईष्र्या व द्वेष से भरा होता है।
शान्त वर्ग की स्त्रियां शान्त स्वभाव की होती हैं तथा विवेकी होती हैं। वे हमेशा शत्रुओं व आलोचकों से घिरी होती हैं मगर घबराती बिलकुल नहीं। उनमें ईष्र्या द्वेष नहीं होता। वे आचार-व्यवहार में सावधानी बरतती है, मितभाषी होती हैं, तथा हर काम को संयम के साथ करती हैं। याद रखें कि शान्त वर्ग की स्त्रियां आसानी से नाराज नहीं होती पर अगर पारा चढ़ गया तो जल्दी उतरता नहीं।
पतिव्रता वर्ग की स्त्रियां वास्तव में इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ती हैं मगर मानसिक रूप से काफी पिछड़ी होती हैं। पति को परमेश्वर मानती हैं तथा तन-मन से उसकी सेवा करती है। शराबी पति को भी वे क्षमा कर देती है। उसके अत्याचार को नतमस्तक हो सह लेती हैं। किसी के साथ दु:ख को बांटना पति के साथ विश्वासघात समझती हैं।
गुस्सा कुपिता वर्ग की स्त्रियों की नाक पर चढ़ा होता है। इस वर्ग की स्त्रियों को तुलना ज्वालामुखी से की जा सकती है। कुपिता स्त्री जी भर कर गुस्सा उतारने के बाद स्वत: शान्त हो जाती हैं। गुस्से की स्थिति में कोई उन्हें छेड़ देता है तो घर में महाभारत पैदा हो जाती है। अत: इस तरह की स्त्रियों से सावधान रहना श्रेयस्कर होता है।
कुपिता वर्ग की स्त्रियां जब लड़-झगड़कर शान्त हो जाती हैं, अपने किए-कराए पर मन ही मन पश्चाताप करती हैं मगर किसी से क्षमा नहीं मांगती, क्योंकि उन्हें स्वयं पता नहीं होता कि फिर कब उनका पारा चढ़ जाएगा और फिर कब अशान्ति फैलेगी। बार-बार क्रोधित होकर, फिर क्षमा मांगकर वे लोगों के सामने हास्यास्पद नहीं बनना चाहतीं।
- आर. सूर्य कुमारी

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