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''गजल''

देर से ही सही

वो दर्द, वो पीड़ा असहनीय।

कम तो नहीं होगी।

हाँ! देर ही से सही।

इंसाफ मिला तो सही।

जिस्म क्या हुई थी जख्मी आत्मा भी।

मरहम वक्त का मिला तो सही।

लौटकर न आएगी

बेटी वो देश की।

लेकिन दरिंदों को भी मिलेगी

अब मौत ही।

आंसू नहीं सूखेंगे माना माँ-बाप की आंखों से कभी।

बेटी खो गयी जो आंगन में

हंसती थी कभी।

आत्मा को उसकी राहत तो मिली।

हाँ! देर ही से सही।

इंसाफ मिला तो सही।।

- सविता वर्मा

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