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(गीतिका) होली की चाहत

(गीतिका) होली की चाहत

लेखिका-डॉ.नीलम खरे


अब ख़ुद की पहचान चाहिए ,

अधरों पर मुस्कान चाहिए ।

जीवन रंगों में रँग जाए,

ऐसा ही अरमान चाहिए ।

रो-रोकर जीना है क्योंकर,

सबकी रक्षित आन चाहिए ।

नारी का करते जो शोषण,

उनका अब अवसान चाहिए ।

न्याय,वफ़ा,सत्य,नैतिकता,

नेह भरा जयगान चाहिए।

गॉड,गुरु औ'ख़ुदा-ईश्वर,

सब अब एक समान चाहिए ।

छांव-धूप,फूल या कांटे ,

अब राहें आसान चाहिए ।

एक साथ हों दो तलवारें ,

ऐसी हमको म्यान चाहिए ।

संस्कार का सोना उगले,

ऐसी हमको खान चाहिए ।

मायूसी अब छोड़ें हम सब,

हरदम अब उत्थान चाहिए ।

अपने तक ना हों हम सीमित,

अब तो सबका ध्यान चाहिए !

शौर्य,वीरता,पौरुष के अब,

हमको नित अरमान चाहिए !

रंग,अबीर,गुलाल की रौनक,

हर जन का सम्मान चाहिए ।

"नीलम " चाहे केवल इतना,

हर घर मंगल गान चाहिए !

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