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कविता

  • रक्षाबंधन

    भावों का है मेला,मन चहके ,महके सावन।लगता सबको सुखकर, प्रिय, रक्षाबंधन ।। अहसासों की बेला,प्रीतातुर यह बंधन नेह पल्लवित होता,उल्लासित जीवन कजरी,झूले,मेले,टिकुली,चटख रंग की मेंहदी सावन का ये पर्व अनूठा,खुश भाई-दीदी शुभ-मंगलमय गीत,पर्व का अभिनंदन । लगता सबको सुखकर, प्रिय, रक्षाबंधन ।। ...

  • बाल गीत : दो दिन का मेला

    अभी डाल में फूल खिला है,इतराता है फूला फूला। उसे पता है कुछ घंटों में, बिखर जाएगा यह घरघूला। पल दो पल के इस जीवन में, फिर क्यों जिएं उदासी ओढ़े। क्यों न फर्राकर दौड़ाएं, मस्ती के, खुशियों के घोड़े। कलियों पत्तों और हवा के, अभी सामने तथ्य कबूला। झूम-झूम कर लगा झूलने, फिर-फिर वह...

  • कहानी : अपनी तुलना दूसरों से न करें

    एक बार की बात है, किसी जंगल में एक कौवा रहता था, वो बहुत ही खुश था, क्योंकि उसकी ज्यादा इच्छाएं नहीं थीं। वह अपनी जिंदगी से संतुष्ट था, लेकिन एक बार उसने जंगल में किसी हंस को देख लिया और उसे देखते ही सोचने लगा कि ये प्राणी कितना सुन्दर है, ऐसा प्राणी तो मैंने पहले कभी नहीं देखा! इतना साफ और सफेद। यह ...

  • प्रेम पर हिन्दी कविता : रूह के रिश्ते

    चाहे कितना भी तुम मना करो,मान भी जाओ कि तुम मेरी हो। तपते जीवन की धूपों में, तुम शीतल छांव घनेरी हो। सब रिश्तों से फुरसत, मिल जाए तो। आ जाना जल्दी से, ऐसा न हो देरी हो। रूह के रास्ते पर, हम-तुम खड़े हुए। अब न रुकना तुम, चाहे रात अंधेरी हो। देह तुम्हारी बंटी, हुई है रिश्तों में। कई...

  • बाल कविता : राह तक रही होगी अम्मा

    पूरब के पर्वत से झांका,लाल-लाल सूरज का गोला। मैं बिस्तर से उठ बैठा हूं, सुबह हो गई, मुन्ना बोला। मैं भी उठकर बैठ गई हूं, मुनियां चिल्लाई भीतर से। मुन्ना भैया, चलो घूमने, जल्दी निकलो बाहर घर से। बाहर ठंडी हवा मिलेगी, फूल मिलेंगे मुस्काते से। डाल-डाल पर पंछी होंगे, चहंग-चहंग गाना गाते...

  • राष्ट्रकवि अंजाम ने 'कोरोना' पर कविता से बयां ​की 'किसी बिवाई पर मरहम लगाकर तो देखिए...

    औरैया। कोरोना की त्रासदी और लॉक डाउन की बेबसी ने भले ही लोगों को अनगिनत कष्ट दिए हैं। जनमानस इस अनदेखे-अनजाने वायरस की जघन्य मारण शक्ति से त्राहि-त्राहि कर रहा है। कोविड-19 की छापामार यलगार से पूरा विश्व आर्थिक मोर्चे पर ध्वस्त होता जा रहा है, बचाव के बंकर तलाशे जा रहे हैं। सरकारों से रोज उनकी...

  • कविता-झूठ का सहारा

    सच्चाई का मुखोटा उतार आया हूँ। बस आज मैं खुद को मार आया हूँ।। सच्चाई से मैं अपनी बहुत परेशां रहा हूँ। अब अपने लिए झूठ का नकाब लाया हूँ।। हर तरफ अब झूठ और मक्कारी छायी है। मेरी सच्चाई इस भीड़ में बहुत घबराई है।। हर एक,दूसरे से तीसरे की बुराई कर रहा है। फिर तीसरे के साथ मुस्कुराकर गले...

  • (गीतिका) होली की चाहत

    लेखिका-डॉ.नीलम खरे अब ख़ुद की पहचान चाहिए , अधरों पर मुस्कान चाहिए । जीवन रंगों में रँग जाए, ऐसा ही अरमान चाहिए । रो-रोकर जीना है क्योंकर, सबकी रक्षित आन चाहिए । नारी का करते जो शोषण, उनका अब अवसान चाहिए । न्याय,वफ़ा,सत्य,नैतिकता, नेह भरा जयगान चाहिए। गॉड,गुरु...

  • कविता: अब ना आयेंगे माधव

    कमजोर नहीं जो टूट जाओ, नादान नहीं जो रूठ जाओ। बेपरवाह नहीं की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ जाओ। कमतर नहीं किसी से कि अपना हक छोड़ जाओ। बहुत सहा सदियों से और नहीं अब सहना है। मान-सम्मान के नाम पे, ना अग्नि परीक्षा देती जाओ। आएंगे न माधव अब, सुनो लो चीर बढ़ाने को बन चट्टान सी उठो और अपना चीर संभालो तुम।...

  • कम्प्यूटर युग में

    कम्प्यूटर युग से जुड़कर हम हम बड़े हैं मानी, अब न समस्यायें लगती हैं उलझी-जटिल-पुरानी। बिना किसी अटकलबाजी के जब हैं चाहते जैसा, पलक झपकते पा लेते नित इच्छित पल हम वैसा। समय नहीं वह दूर, बंधुओं, आयेगा वह काल, अपने देश की गुत्थी का हल लेंगे सहज निकाल। - रामसागर 'सदन'

  • कविता: 'तेरी तारीफ में कितना लिखे कोई'

    तेरी तारीफ में कितना लिखे कोई कम ही लगता है जितना लिखे कोई ये उम्र ही कम पडने लगे लिखते-लिखते सात जन्म तक भी गर लिखे कोई और कुछ याद रहे या ना रहे याद ऐसे लिखे तेरे प्यार में जैसे सपना लिखे नज्म खुद ब खुद बन जाती है जब तेरा हंसना बोलना लिखे कोई तेरी आवाज में और तेरी हर अदा पे तेरा रूकना और...

  • ''गजल''

    देर से ही सही वो दर्द, वो पीड़ा असहनीय। कम तो नहीं होगी। हाँ! देर ही से सही। इंसाफ मिला तो सही। जिस्म क्या हुई थी जख्मी आत्मा भी। मरहम वक्त का मिला तो सही। लौटकर न आएगी बेटी वो देश की। लेकिन दरिंदों को भी मिलेगी अब मौत ही। आंसू नहीं सूखेंगे माना माँ-बाप की आंखों से कभी। बेटी खो गयी जो...

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