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बचा कर रखें बच्चे को बाजारू खाद्य पदार्थों से

बचा कर रखें बच्चे को बाजारू खाद्य पदार्थों से

जब नीना के घर पहुंची तो देखा कि वह अपने 13 वर्षीय रूठे बेटे को मना रही थी क्योंकि बेटे ने स्कूल से आने पर खाना नहीं खाया था। वह जिद्द पर अड़ा था कि 'मुझे बाजार से खाने के लिए कुछ मंगवा दो। यह समस्या अधिकतर माताओं की है जहां बच्चे अपनी इच्छा पूरी करवाने हेतु मां-बाप की नाक में दम कर देते हैं। मैंने इस विषय पर कुछ माता-पिता से बात की जिसके आधार पर मैं निम्न निष्कर्षों पर पहुंची हूं।

कारण:- सबसे बड़ी समस्या छोटे तथा एकल परिवारों की है। एक या दो बच्चों के परिवार में मां बाप बच्चों की ओर अधिक ध्यान दे पाते हैं जिसका बच्चे पूरा लाभ उठाते हैं। जब बच्चे छोटे होते हैं तो मां-बाप, दादा-दादी सब उनके पीछे-पीछे खाना लेकर भागते रहते हैं कि किसी प्रकार से बच्चा कुछ खा पी ले। उनके लिए खाने की चीजों में विभिन्नता रखी जाती है कि बच्चों को एक ही तरह के भोजन से अरूचि न हो जाए। यदि बच्चा एक चीज नहीं खाता तो दूसरी चीज तैयार रखते हैं कि बच्चा कुछ खा ले, भूखा न रहे। इससे बच्चे खुद को अति महत्त्वपूर्ण समझने लगते हैं।

टी.वी. और केबल का अधिक प्रचलन भी बच्चों के खाने-पीने की आदतों को बिगाडऩे में सहायक है। खाने-पीने की नई नई चीजों के विज्ञापनों को देखकर बच्चों के मन में उन चीजों को खाने की लालसा बढ़ जाती है। दिन भर बच्चे एक ही विज्ञापन को कई बार देखेंगे तो उनकी इच्छा भी चाकलेट, मैगी, वफर्स, आलू चिप्स, बिस्कुट, शीतल पेय आदि का स्वाद लेने की हो जाती है।

भारतीय संस्कृति के अनुसार जब हम परिजनों के घर जाते हैं या परिजन हमारे घर आते हैं तो बच्चों के लिए टाफी, चाकलेट, डिब्बाबंद जूस, आलू चिप्स आदि उपहार ले आते हैं जिससे बच्चों को इस प्रकार का खाना खाने में हम लोग भी सहयोग देते हैं।

समाधान:- इन सब समस्याओं को शुरू से दूर करने की कोशिश की जाए तो कुछ हद तक हम इनसे बच सकते हैं। बिगड़े हुए बच्चों को सुधार पाना तो कुछ मुश्किल है, ऐसे में मनोवैज्ञानिकों की मदद ली जा सकती है किन्तु बच्चे न बिगड़ें, इसके लिए प्रारंभ से कुछ सावधानियां बरतना बेहतर होगा। घर में प्रारंभ से पौष्टिक भोजन की ओर अधिक ध्यान दिया जाए। मां-बाप को फास्ट फूड और जंक फूड का सेवन कम करना चाहिए। भोजन में सलाद, दही, अंकुरित दालें, फल, हरी सब्जियों का प्रयोग अधिक करना चािहए। बच्चों को टी.वी. कम से कम समय देखने दिया जाये। खाली समय का सदुपयोग खेलों, वाद्य यन्त्र सिखाने, चित्रकारी करने, अच्छी पुस्तकें पढऩे में करना सिखाएं। स्वयं भी टी.वी. कम देखें। यदि देखें तो सपरिवार साथ-साथ एक निश्चित समय के लिए जिसमें अच्छे प्रोग्रामों का चयन माता-पिता करेें।

परिजनों को चाकलेट, टाफी, बिस्कुट आदि लाने पर निरूत्साहित करें। स्वयं भी उनके घर जाते समय ऐसे तोहफे न ले जायें। ऐसे में फल, अच्छी पुस्तकें, चित्रकारी आदि का सामान उचित है। यदि बच्चे खाना खाने में बहुत नखरे दिखाएं तो उनके आगे पीछे अधिक न घूमें। भूख लगने पर वे स्वयं भोजन खायेंगे। अधिक मनुहार भी हानिकारक होता है।

बच्चों और परिवार के सदस्यों से चर्चा करके खाने का मीनू पहले तय कर लें। यह ध्यान रखें कि संतुलित आहार में बच्चों की पसंद को उचित स्थान मिले। बाल रोग विशेषज्ञों को भी संतुलित आहार बच्चों की आयु अनुसार बताना चाहिए। स्कूल कैन्टीनों को भी स्कूल अध्यापिकाओं द्वारा निरूत्साहित किया जाना चाहिए। बच्चों को अध्यापिकाएं यह सिखाएं कि कैन्टीन या बाहरी भोजन केवल मुसीबत के समय ही जरूरी हैं।

मां बाप भी बच्चों को बाहरी खाद्य पदार्थों के लिए उत्साहित न करें। सारा परिवार मिल कर भोजन करे जिससे बच्चे मां बाप को भी वही खाना खाते देखें जो खाना बच्चों को दिया जा रहा है। खाने के तरीकों में कुछ विभिन्नता बनाए रखें। खाने के समय पढ़ाई के विषय में या अन्य बच्चों की प्रशंसा न करें। हल्का-फुल्का मजाक खाने के जायके को बढ़ाता है इस ओर विशेष ध्यान रखें।

- सुनीता गाबा

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