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सेहत के लिए अमृत जैसी है अमृता यानी गिलोय

सेहत के लिए अमृत जैसी है अमृता यानी गिलोय

आयुर्वेद में 50 से अधिक साधारण और कठिन बीमारियों में गिलोय यानी अमृता का प्रयोग अकेले या अन्य जड़ी बूटियों के साथ करने का विवरण मिलता है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने अमृता के गुणों तथा उपयोगों पर रिसर्च करके पाया है कि अमृता में शरीर की प्रतिरोधक शक्ति अर्थात् रोगों से लडऩे की क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाने के विशिष्ट गुण है, जिसके कारण यह अनेक रोगों में प्रभावशाली है। अमृत जैसे गुणों से भरी होने से इसे अमृता कहा गया है।

लिवर डिजीज:-दृवायरल इन्फेक्शन, खान पान की गड़बड़ी या अन्य कारणों से लिवर की क्रि या गड़बड़ाती हैं। गैस बनती है, भूख कम हो जाती है। खाने के बाद पेट में भारीपन होने लगता है। कई आधुनिक दवाएं भी लिवर के लिए हानिकारक हैं। पित्त बनने और पित्त बहाव में बाधा से पीलिया या जान्डिस हो सकता है। आयुर्वेद में लिवर को सक्रि य करने के लिए अनेक दवाएं हैं, जिनमें अमृता प्रमुख है। यह लिवर की हर गड़बड़ी ठीक करने में सहायक है। यह बात आयुर्वेद के साथ रिसर्च में भी प्रमाणित हो चुकी है।

कैंसर: कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी चिकित्सा की जाती है। इनसे अनेक समस्याएं हो जाती हैं जैसे- भूख कम लगना,पाचन क्रि या में गड़बड़ी, श्वेत तथा लाल रक्त कणों का कम होना आदि। अमृता इम्युनिटी बढ़ाने के साथ ही अस्थि मज्जा की सक्रि यता बढ़ाता है।

मधुमेह: मधुमेह रोगियों में ब्लडशुगर लेवल कम करने में अमृता का तना, पत्तियां और जड़ उपयोगी हैं। मधुमेह के कारण रोगियों की किडनी, लिवर तथा अन्य अंगों पर बुरा असर पड़ता है। अमृता के उपयोग से मधुमेह के कारण होनेवाले कुप्रभाव कम हो सकते हैं।

फायब्रायड: रोग की प्रारंभिक अवस्था में जब गांठ छोटी हो, तब छह माह तक अमृता का प्रयोग सुबह शाम करने से समस्या समाप्त होती है और मासिक धर्म भी सामान्य हो जाता है।

सोरायसिस: यह कठिन चर्म रोग है। लंबे समय तक अमृता लगाने एवं सेवन से लाभ होता है। साथ ही कुटकी, कुटज, मंजिठ, नीम, तीसी आदि के प्रयोग के साथ ही खानपान में परहेज से राहत मिलती है।

आमवात: रूमेटाइड आर्थराइटिस कठिन रोग है जो पूरी तरह से ठीक नहीं होता है। इसकी चिकित्सा में अधिक मात्र में अमृता के साथ सोंठ या अदरक का प्रयोग निरंतर करने से रोगी के कष्ट काफी कम हो जाते हैं।

किडनी एवं मूत्र रोग: किडनी की गडबड़ी की शुरूआत में ही अमृता के प्रयोग से काफी हद तक किडनी की क्षतिपूर्ति होती है। महिलाओं को संक्र मण के कारण बार-बार पेशाब में जलन और जल्दी जल्दी पेशाब लगने की शिकायत होती है। एंटीबायोटिक दवाओं से लाभ होता है लेकिन कुछ दिनों के बाद पुन: इन्फेक्शन हो जाता है। अमृता का प्रयोग निरंतर कुछ महीनों तक करने से समस्या से छुटकारा मिल जाता है। अमृता के साथ पुनर्नवा, गोखरू एवं वरूण छाल का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है।

थ्राम्बोसाइटोपीनिया: इस रोग में खून बहने को रोकने वाले प्लेटलेट नामक रक्त कोशिकाओं की संख्या कम हो जाती है। अमृता के प्रयोग से प्लेटलेट की संख्या दो-तीन सप्ताह में बढऩे लगती है। ऐसा सैंकड़ों रोगियों में प्रयोग से देखा गया है।

हड्डी टूटने पर: हड्डी टूटने पर प्लास्टर के साथ अमृता का प्रयोग दो सप्ताह तक करने से टूटी हड्डी जल्द जुड़ती है और जोड़ मजबूत होता है। अनेक बार हड्डी जुडऩे में परेशानी आती है, ऐसी स्थिति में अमृता का प्रयोग लाभदायक होता है। हड्डी टूटने पर रोगी को अमृता का प्रयोग दो सप्ताह तक अवश्य करना चाहिए।

व्यवहार करने के तरीके : अमृता के परिपक्व तने का सबसे ज्यादा उपयोग होता है। तने की मोटाई अंगूठे के बराबर या उससे अधिक होनी चाहिए। पतले तनों में गुण कम होते हैं। अमृता का पूरा लाभ इसके तने के स्वरस से मिलता है। स्वरस ताजा हो, तो अच्छा है। इसके अलावा अमृता चूर्ण और अमृता घन वटी के रूप में भी इसका प्रयोग होता है।

- शिखर चंद जैन

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