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मोटापा-डायबिटिज, हार्ट, बीपी व कैंसर रोग का जनक है

मोटापा-डायबिटिज, हार्ट, बीपी व कैंसर रोग का जनक है

वर्तमान में पिछले तीन दशक में पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव बढ़ा है, खास तौर पर शहरी इलाकों में। यहां भी सामान्य मीठे के साथ ही हमारी युवा पीढ़ी उन पेय पदार्थों की आदी हो गई है जिसके जरिये नियमित रूप से अतिरिक्त शर्करा शरीर में जा रही है। यह सत्य है कि भारत चीनी उपभोग के मामलों में विश्व में अव्वल है। चीनी के अधिक सेवन के कारण ही मोटापा बढ़ रहा है जो डायबिटिज एवं हार्ट संबंधी बीमारियों का जनक है।

ऐसे मिलती है ऊर्जा:- (1) अन्य खाद्य पदार्थों और चीनी से मिलने वाले कार्बोहाइडेऊट को उदर ग्लूकोज में बदल देता है। (2) ग्लूकोज रक्त प्रवाह में मिलते लगता है। (3) अग्नाशय पर्याप्त मात्र में इंसुलिन का निर्माण करता है जो ग्लूकोज शरीर में प्रवाहित करता है। (4) ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं तक पहुंच कर ऊर्जा देता है। (5) अगर इंसुलिन की मात्र पर्याप्त रूप में नहीं हो तो रक्त में ग्लूकोज की मात्र बढ़ जाती है जो मधुमेह का कारण बनती है।

लिवर में जमा होता है ग्लूकोज:- कार्बोहाइड्रेट के रूप में लिया गया ग्लूकोज लिवर तक पहुंचता है और ग्लाइकोजन के रूप में वहां जमा हो जाता है। जब खून में ग्लूकोज की कमी होने लगती है तो लिवर अपने पास जमा ग्लूकोजन को रिलीज करने लग जाता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए लिवर में 100 ग्राम ग्लाइकोजन जमा होता है जो सामान्य व्यक्ति को 24 घण्टे तक ऊर्जा देने के लिए पर्याप्त है।

शरीर में कार्बोहाइडे्रट की पूर्ति के लिए चीनी का सेवन जरूरी है लेकिन इसका अत्यधिक सेवन शरीर पर विपरीत असर डाल सकता है। अगर शरीर में कार्बोहाइडेऊट की कमी होगी तो ऊर्जा के लिए प्रोटीन (एमिनो एसिड) और वसा (फैटी ऐसिड) पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इस वजह से कार्बोहाइड्रेट की पूर्ति के लिए चीनी का संयमित सेवन उचित है लेकिन अत्यधिक सेवन कई तरह की व्याधियों का कारण बन सकता है। इससे मोटापा बढ़ सकता है और जिन लोगों के शरीर में इंसुलिन हॉर्मोन में समस्याएं हैं। उनमें यह डायबिटिज की समस्या पैदा कर सकता है।

अत्यधिक सेवन किसी भी चीज का बुरा है। शरीर को प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइडे्रट जैसी सभी जरूरी चीजें चाहिए। केवल निर्धारित कैलोरी की आवश्यकता की पूर्ति करना ही जरूरी नहीं है। भोजन में विविधता होनी चाहिए।

कॉर्बोहाइडे्रट की आवश्यकता व्यक्ति की उम्र, शारीरिक स्थिति और पैरों पर निर्भर करती है। खिलाडिय़ों व शारीरिक श्रम करने वाले लोगों को कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों से अधिक कार्बोहाइडे्रट की आवश्यकता होगी। यह साइकलॉजिकल पहलू है कि थकान महसूस होते ही ग्लूकोज या शर्करा युक्त दूसरा पेय पदार्थ लेने पर इंस्टेंट एनर्जी मिलती है।

भूख लगने पर जिस तरह से भोजन करते ही दिमाग को तरोताजा महसूस होता है, उसी तरह थकान के समय शुगर (ग्लूकोज) लेने पर दिमाग को ताजगी महसूस होती है। ऊर्जा मिलने की प्रक्रि या कुछ देर बाद शुरू होती है। ग्लूकोज लिवर में जमा होता है और इसके बाद रक्त के माध्यम से वह सभी कोशिकाओं तक पहुंचता है।

शरीर निश्चित मात्र तक ही शुगर को पचाने की क्षमता रखता है लेकिन जब हम इसका अधिक सेवन करने लगते हैं तो यह शरीर में इकटठी होनी शुरू हो जाती है।

रासायनिक परिवर्तन के बाद यह सिंपल शुगर फैट में बदल जाती है। अगर यह फैट इसी तरह शरीर में बढ़ता रहे तो मेटाबॉलिज्म से होने वाले रोग होने लगते हैं।

खानपान की आदतों में बदलाव से मेटाबॉलिज्म की प्रक्रि या पर बुरा असर पड़ता है और इससे ब्लड शुगर और कॉलेस्ट्रोल की स्थिति बिगड़ती है। इस कारण उच्च रक्तचाप, डायबिटिज, कैंसर जैसी बीमारियां पनप रही हैं और भविष्य में दिल के रोग का खतरा बढ़ रहा है अत: इसके लिए सावधानियां रखें।

-अनोखी लाल कोठारी

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