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वेगों को रोको मत

वेगों को रोको मत

व्यक्ति के स्वस्थ होने का अर्थ यह है कि उसके शरीर का अंग-अंग चुस्त-दुरूस्त और संपूर्ण हो, यानी शरीर का हर भाग अपने-अपने कार्य का निर्वाह करने में समर्थ हो। शरीर न अधिक मोटा हो, न अधिक दुर्बल। मन-मस्तिष्क के साथ शरीर पर उसका पूर्ण अधिकार हो।

स्वस्थ रहने के लिए मन एवं शरीर दोनों का स्वस्थ होना अनिवार्य है। यदि व्यक्ति का शरीर स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट है किंतु मन दुर्बल, अस्वस्थ एवं रोगी है तो ऐसी शारीरिक स्वस्थता किसी भी काम के लिए उपयोगी नहीं है। मन की प्रेरणा से ही शरीर को कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। अस्वस्थ मन द्वारा किया गया कभी काफी भी सुचारू रूप से पूर्ण नहीं हो सकता।

इसी तरह यदि मन स्वस्थ है और शरीर दुर्बल तो मन द्वारा प्रेरित कार्य को शरीर की दुर्बलता निष्क्रि य बना देगी। अत: पूर्ण स्वास्थ्य के लिए मन और तन दोनों का स्वस्थ होना आवश्यक है। इसके लिए शरीर के अंदर होने वाले वेगों की ओर ध्यान देना भी जरूरी है।

शरीर के अंदर के वेग:- शरीर में कुछ दाब या वेग ऐसे होते हैं जिन्हें रोकना खतरे की घंटी बजाने जैसा है। छींक आने पर तेजी से हवा का बाहर आना एक वेग है। जम्हाई, डकार या आंसू आना भी वेग है तो भूख लगना, मल और मूत्र के दाब भी वेग कहलाते हैं। आयुर्वेद में इन सामान्य क्रि याओं का सेहत की दृष्टि से बड़ा महत्त्व है। श्रेष्ठ स्वास्थ्य के लिए इन्हें कभी रोकना नहीं चाहिए, जाने देना चाहिए।

मूत्र वेग:- इसे रोकने पर पेड़ू में दर्द, मूत्राशय में दर्द, सिर दर्द, पेट का निचला हिस्सा फूल जाता है। अधिकांशत: संकोचीपन के कारण महिलाओं में यह प्रवृत्ति अधिक होती है।

मल वेग:- उचित स्थानाभाव की कमी धीरे-धीरे आदत बन जाती है। इससे गुदा, पेडू़ और पिंडली में दर्द हो सकता है। कब्ज रहने लगती है और डकारों की अधिकता से मुंह से अन्न निकलने लगता है।

शुक्राणु वेग:- इससे मूत्राशय, गुदा और अंडकोषों में भारीपन, सूजन ओर तेज दर्द होता हैं। गर्भाधान के समय शुक्राणु वेग रोकने से वृषण, शरीर और हृदय में भी पीड़ा हो सकती है।

अपान वायु:- इसे रोकने पर अपान वायु के साथ-साथ मल-मूत्र भी रूक जाता है। पेट फूल जाता है। अन्य वात जनित रोग हो जाते हैं।

वमन वेग:- उल्टी रोकने पर शरीर पर खुजली, सूजन, बुखार और शरीर में चकत्ते आ सकते हैं।

छींक वेग:- इसे रोकने पर गर्दन अकड़ सकती है। आधे सिर में दर्द हो सकता है। इंद्रियों में दुर्बलता, चेहरे का पक्षाघात भी हो सकता है।

जृम्भा वेग:- जंभाई रोकने पर शरीर में संकोच (स्पाज्म) या झटके आ सकते हैं। आंख, नाक, मुख और कान के रोग हो सकते हैं।

श्वास वेग:- परिश्रम से उत्पन्न श्वास के वेगों को रोकने पर हृदय रोग होने की आशंका रहती है।

डकार वेग:- यह रोकने पर हिचकी और खांसी आ सकती है। छाती गले में सुई के समान चुभन और आंतों में गुडग़ुड़ाहट प्रतीत होती है।

भूख वेग:- भूख लगने पर भोजन न किया जाए तो दुर्बलता एवं चक्कर आ सकते हैं। आलस्य व आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता है।

तृष्णा वेग:- प्यास रोकने पर मुंह सूखेगा, कानों से कुछ सुनाई नहीं देगा। अवसाद होगा और अंत में सीने में दर्द होगा।

अश्रु वेग:- आंसू रोकने पर सर्दी, अरूचि, चक्कर आ सकते हैं।

निद्रा वेग:- नींद आने पर न सोने से जंभाई, शरीर दर्द, सिर आंखों में भारीपन लग सकता है।

कुछ रोगों को रोक लो:- कुछ वेग ऐसे हैं जिन्हें रोक लेने से हमारे शरीर को लाभ होता है।

बुरे मानसिक धारणीय वेग:- लोभ, शोक, भय, क्र ोध, अहंकार, निर्लज्जता, ईर्ष्या आदि मनोवेगों को रोक लेने से मनोरोग होने की संभावना कम रहती है।

बुरे वाचिक धारणीय वेग:- कठोर वचन, चुगलखोरी, झूठ बोलना, इनके वेगों को रोकना चाहिए।

कुछ वेगों को रोकने और कुछ को जाने देने से संतुलन बराबर रहता है और शरीर स्वस्थ।

-नरेन्द्र देवांगन

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