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शीतकाल का आहार विहार

शीतकाल का आहार विहार

एक जमाना था जब हमारे पूर्वज संयुक्त परिवारों में रहा करते थे। संयुक्त परिवार के बड़े बूढ़ों से उनके उत्तराधिकारियों को ऋतुओं के अनुसार बालकों, युवाओं, वृद्धों, स्त्रियों, पुरूषों तथा गर्भवती स्त्रियों को कौन-कौन सी वस्तुओं का कम या अधिक सेवन या त्याग करना चाहिए, का अनुभव मिलता रहता था पर आज के छोटे परिवारों को ऋतुओं के अनुसार आहार-विहार का ज्ञान न होने के कारण बालक और युवा लोग कई रोगों से ग्रसित हो जाया करते हैं।

हमारे आयुर्वेदवेत्ताओं ने अपने-अपने ग्रंथों में मानव जाति को निरोग रखने के लिए ऋतुचर्याओं को बड़े ही अच्छे ढंगों से समझाया है पर हर परिवार तक उन गं्रथों का पहुंच पाना संभव नहीं है। ऐसी दशा में केवल पत्र-पत्रिकाएं ही एकमात्र ऐसा माध्यम हैं जो अपने पाठकों तक ऋतुचर्याओं के लेख पहुंचा कर मानव कल्याण में सहयोग कर सकती हैं।

शीतकाल का समय

हमारा सूर्य ज्यों ही दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रवेश करता है, उसकी किरणें तिरछी पडऩे लगती हैं यानी सूर्य का बल सोम के बल से कम हो जाता है। सूर्य अपने गुण-धर्मों के अनुसार प्राणियों के शरीर को सुखाता है और सोम प्राणियों के बल को बढ़ाकर कान्ति प्रदान किया करता है।

हमारा सूर्य राष्ट्रीय आश्विन से राष्ट्रीय फाल्गुन यानी 22 सितम्बर से 21 मार्च दक्षिणी गोलाद्र्ध में रहता है पर शीतकाल के आहार-विहार को माह नवम्बर के उत्तराद्र्ध से माह जनवरी तक ही पूर्ण रूप से धारण करना चाहिए। उपरोक्त अवधि के पूर्व से 15 नवम्बर के पन्द्रह दिनों में धीरे-धीरे आहारादि की मात्र को बढ़ाना चाहिए तथा अन्त के 15 दिनों में 15 जनवरी में आहारादि की मात्र को घटाते हुए भारी और गरिष्ठ पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए।

शीतकाल का प्रभाव

शीतकाल में सूर्य की किरणें तिरछी पडऩे के कारण हमारा बाहरी वातावरण बहुत ठण्डा हो जाता है। ठण्डे वातावरण के कारण हमारे शरीर के रोम सिकुड़ जाते हैं जिसके कारण हमारे शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती। अत: अन्दर की गर्मी बढ़ जाने के कारण हमारी जठराग्नि प्रबल होकर स्निग्ध और भारी खाद्य पदार्थों को पचाने में सक्षम हो जाती है।

हमारे भोज्य पदार्थ जितने अधिक और अच्छे पचेंगे, उतना ही अधिक रस बनेगा। रस अधिक बनेगा तो रक्त, मांस, मज्जा, हाड़ आदि भी अधिक बनेंगे। इससे हमारा शरीर निरोग और सुडौल बना रहेगा।

इस मौसम की रातें बड़ी होने के कारण रात में किया गया भोजन रात ही में पच जाया करता है। अत: शीतकाल में प्रात: उठते ही नित्यकर्मों से निवृत्त होकर गरिष्ठ पाक, लड्डू, दूध, मलाई, मेवा, हलुआ आदि का कलेवा (नाश्ता) लेकर अन्य कार्यों में लगना चाहिए। जो लोग महंगे खाद्य पदार्थ न खरीद सकें, उन्हें बाजरे का दलिया और थोड़ा-सा गुड़ खा लेना चाहिए। जो लोग बाजरा भी न पचा सकें, उन्हें जो भी रूखा-सूखा मिल जाये, वही खा लेना चाहिए।

यह बात तो ऊपर ही बताई जा चुकी है कि शीतकाल में प्राणियों की जठराग्नि प्रबल हो जाया करती है अत: सर्दी की भूख को कभी भी नहीं मारना चाहिए क्योंकि हमारी जठराग्नि को भोजन नहीं मिलेगा तो वह हमारे रस और रक्त को ही पचाने लग जाती है जिससे शरीर रोगी और दुर्बल हो जाता है। हां, पचास वर्ष से अधिक उम्र वालों को अधिक घृत का सेवन नहीं करना चाहिए। इसकी पूर्ति के लिए उन्हें दूध और लहसुन का सेवन करना चाहिए तथा नित्य सरसों या तिल्ली के तेल की हल्की मालिश करनी चाहिए।

आहार अर्थात् खानपान

शीतकाल (हेमन्त और शिशिर) को छोड़कर अन्य सभी मौसमों में नये अन्नों का सेवन करना वर्जित है जबकि शीत काल में खरीफ की फसल में पैदा हुए नये अन्नों का लेना पथ्य (लाभदायक) माना गया है। अन्य मौसमों में नये अन्न पचने में भारी पड़ा करते हैं। इस मौसम में मारवाड़ी, बाजरी, शाली, चावल, उड़द की दाल तथा थोड़े से गुड़ का सेवन करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

मगसर, पौष और माघ के महीनों में खट्टे, मीठे, नमकीन, घृत, तेल, स्निग्ध और भारी पदार्थों, उड़द, गेहूं, मैदा, सूजी, चावल, बाजरा, ज्वार, मक्का, दूध तथा नमकीन अन्नों से बने पदार्थों का बना सामान्य गर्म भोजन करना चाहिए।

शीतकाल का आहार-विहार

शिशिर ऋतु (पोष-माघ) में सर्दी का प्रकोप और अधिक बढ़ जाता है अत: इस मौसम में सुगन्धित अवलेह तथा बलवद्र्धक गरिष्ठ (पर जो कड़वे और कसैले न हों), खट्टी-मीठी चटनियां, वसा, मैदा, सूजी, सूरन की तरकारी तथा गन्ने से बने पदार्थों का सेवन बढ़ा देना चाहिए। इनके अलावा पालक, मूली, गाजर, आलू, टमाटर, लौकी, मेथी, बथुआ, शलगम, चुकन्दर, अरबी, कच्ची हल्दी तथा गवारपाठे की फलियों का सेवन बड़ा लाभदायक रहता है।

मांसाहारी बिलेशियों (बिलों में रहने वाले) महामृगों (भारी और बलवान पशुओं) जलचर, प्रहस श्रेणी तथा कुलीन पक्षियों का मांस तथा अण्डे का सेवन कर सकते हैं। सामान्य मात्र में ली गई मदिरा भी लाभदायक रहती है।

इस ऋतु में बल प्रदान करने वाले टॉनिक, रस, रसायन, लेह, चटनी, चूर्ण, पाक, मग्ज़-मेवे आदि का सेवन करना चाहिए। जो लोग महंगे और स्निग्ध पदार्थ न खरीद सकें, उन्हें सफेद तिल या मूंगफली (मात्र 25 से 50 ग्राम) थोड़े से गुड़ के साथ खूब चबा-चबा कर खानी चाहिए।

शाकाहारियों को एक आंवले का मुरब्बा नित्य लेना चाहिए। एक आंवला एक अण्डे के बराबर गुणों को धारण करने वाला होता है। यदि एक आंवले के साथ एक चांदी का शुद्ध वरक और दो चुटकी शितोपलादि चूर्ण मिला लिया जाये तो अति उत्तम रहता है। जो व्यक्ति केशर-कस्तूरी, मग्ज़-मेवों से बनी खीर का सेवन नहीं कर सकें, उन्हें लहसुन की खीर या पाक का सेवन करना चाहिए। जहां शिशिर ऋतु नहीं होती, उन्हें भारी और स्निग्ध पदार्थों का हेमन्त ऋतु से ही सेवन कर लेना चाहिए।

जब शीत लहर या ठण्ड अधिक बढ़ जाये तो हरड़ और पीपल (समान मात्रा) में दुगुनी मिश्री मिला चूर्ण (मात्रा चाय का छोटा चम्मच) गुनगुने पानी से प्रात: काल में सेवन करना चाहिए तथा नित्य शरीर पर मालिश करनी चाहिए।

-वैद्य पं. श्याम स्वरूप जोशी

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