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जानसठ के मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना नजीर अहमद कासमी का इंतकाल, मुस्लिम समाज में शोक की लहर

जानसठ के मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना नजीर अहमद कासमी का इंतकाल, मुस्लिम समाज में शोक की लहर

जानसठ। जानसठ में मुस्लिम समाज के धर्मगुरु मौलाना नजीर अहमद कासमी का आज सुबह के समय आकस्मिक इंतकाल हो गया, जिसकी खबर क्षेत्र में हवा की लहर की तरह फैल गई। खबर सुनते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई और काफी लोग मदरसे में इकट्ठे हो गए, दोपहर के समय 2 बजे उन्हें नम आंखों से सुपुर्द ए खाक कर दिया गया।

रविवार को सुबह के समय लंबी बीमारी के चलते मदरसा तालीमुल कुरान जानसठ के संस्थापक व धर्मगुरु मौलाना नजीर अहमद कासमी का इंतकाल हो गया। वह लगभग 82 साल के थे। मौलाना काफी समय से बीमार चल रहे थे। शनिवार को उनकी तबीयत खराब होने के बाद मुजफ्फरनगर के एक निजी चिकित्सालय में भर्ती कराया था, जहां पर उन्होंने आज सुबह अंतिम सांस ली, जिसकी खबर सुनते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई और काफी संख्या में लोग मदरसे में एकत्र हो गए। दोपहर के समय नमाज के बाद 2 बजे उन्हें नम आंखों से सुपुर्द ए खाक कर दिया गया। बताया गया कि मौलाना के 4 बेटे व चार बेटियां थी, जिनमें एक बेटी का इंतकाल हो चुका है तथा एक बेटा बाहर रहता है जो जनाजे में शामिल नहीं हो पाया।

1974 में की गई थी मदरसे की स्थापना: तालीमुल कुरान मदरसा जानसठ की स्थापना सन् 1974 में मौलाना नजीर अहमद कासमी द्वारा की गई थी, जिसमें देश के हर कोने से सैकड़ों बच्चे तालीम हासिल कर रहे हैं। उनकी गिनती देश के जाने-माने धर्म गुरुओं में होती थी। उन्होंने मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए जीवन भर प्रयास किया। उनके निधन से आसपास के लोग दुखी हैं।

कवाल कांड के बाद सपा सरकार ने मौलाना को दिलाई थी वाई श्रेणी की सुरक्षा: कवाल गांव में हत्याकांड के बाद क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम कराने की पहल के लिए तत्कालीन सपा सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जानसठ के मौलाना नजीर अहमद को वाई श्रेणी की सुरक्षा दी थी। सपा सरकार में चर्चित गांव कवाल में जाने से रोकते हुए उन पर पुलिस ने मुकदमा भी दर्ज किया था।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मौलाना के लिए भेजा था विशेष विमान: तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने क्षेत्र में शांति कराने के लिए विशेष विमान मेरठ में भेजकर मौलाना को लखनऊ में बुलवाया था। इस विमान में दिल्ली के रहने वाले कांग्रेस पार्टी से जुड़े नेता भी आए थे। लखनऊ से लौटते ही तत्कालीन मौलाना को वाई श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गयी थी। दंगों के दौरान करीब दो साल तक मौलाना वाई श्रेणी की सुरक्षा में रहे।

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