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भारतीय संस्कृति में नवरात्र

भारतीय संस्कृति में नवरात्र

भारतीय संस्कृति मानव समाज की अमूल्य निधि है। यदि संसार की कोई संस्कृति अमर कही जा सकती है तो निस्संदेह वह भारतीय संस्कृति ही है जो अपनी समस्त आभा और प्रतिभा के साथ चिरकाल से स्थायी है। इसकी ज्योति युगों युगों से प्रज्वलित होती रही है। दुनियां के रंगमंच पर विभिन्न संस्कृतियों का उदय और अंत हुआ, परन्तु भारतीय संस्कृति अपनी मौलिकता एवं अनूठेपन के कारण आज भी एक निरन्तर धारा के रूप में प्रवाहित हो रही है। भारतीय समाज को अनेक त्यौहार, पर्व तथा रस्में वैदिक काल से ही विरासत के रूप में मिलती रही हैं। इन्हीं त्यौहारों और पर्वों की श्रृंखला में एक है 'दुर्गा पूजा' जिसे उत्तर भारत में 'नवरात्र' के नाम से जाना जाता है। यह पर्व मुख्यत: वर्ष में दो बार मनाया जाता है। प्रथम बार नववर्ष के प्रारम्भ में चैत्रमास के शुक्लपक्ष में तथा दूसरी बार दशहरा के निकट आश्विन मास में मनाया जाता है। यह पूरे भारतवर्ष में विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा बड़ी श्रद्धा एवं भक्ति से मनाया जाता है। यह पर्व पूरे राष्ट्र को एकता एवं भाईचारे के सूत्र में पिरोता है। इस पर्व पर मुख्यत: 'शक्ति' की उपासना की जाती है। यह पर्व एक दिन का नहीं वरन् नौ दिनों का होता है। प्रत्येक दिन की एक अधिष्ठात्री देवी होती है। इन देवियों का परिचय इस प्रकार है-

प्रथमं शैलपुत्री व चिद्वतीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीय चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।

पंचमं स्कन्धमातेति षष्ठं कात्यायनिति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।

नवमं सिद्विदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

उक्त्तान्येतातिन नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।।

उक्त्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मा।। (दुर्गा सप्तशती)

अर्थात् प्रथम दिवस की अधिष्ठात्री देवी का नाम 'शैलपुत्री' है। यद्यपि यह सबकी अधीश्वरी हैं तथापि हिमालय की तपस्या एवं प्रार्थना से प्रसन्न हो कृपापूर्वक उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुई। दूसरे दिन की अधिष्ठात्री देवी 'ब्रह्मचारिणी' हैं। 'ब्रह्म चारियितुं शील यस्या: सा ब्रह्मचारिणी' अर्थात् सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूप ही प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे 'ब्रह्मचारिणी' हैं।

तीसरे दिन की देवी का नाम 'चन्द्रघण्टा' है। चतुर्थ दिवस की देवी भगवती 'कूष्माण्डा' कहलाती हैं। पांचवें दिवस की अधिष्ठात्री देवी 'स्कन्धमाता' हैं। छंदोग्य श्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम 'स्कन्ध' है। उनकी माता होने से 'स्कन्धमाता' कहलाई। छठे दिन की देवी को 'कात्यायनी' कहते हैं। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए देवी कात्यायन ऋषि के आश्रम पर प्रकट हुई।

महर्षि ने उन्हें अपनी कन्या माना, इसी से इनकी कात्यायनी नाम से प्रसिद्धि हुई। सातवें दिवस की देवी का नाम 'कालरात्रि' है। आठवें दिन की देवी ने तपस्या द्वारा महान गौर वर्ण प्राप्त किया, अत: 'महागौरी' कहलाई। नवीं दुर्गा का नाम 'सिद्धिदात्री' है। इस प्रकार से ये नौ देवियां नौ दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं।

-रवीन्द्र नाथ शुक्ल

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