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नवरात्र विशेष: और रक्तबीज मारा गया

नवरात्र विशेष: और रक्तबीज मारा गया

चन्ड-मुन्ड नामक राक्षसों के मारे जाने तथा बहुत सी सेना का संहार हो जाने पर राक्षसों के राजा प्रतापी शुंभ के मन में बड़ा क्रोध हुआ। उसने राक्षसों की सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिए चलने का आदेश दिया। वह बोला-आज उदायुध नाम के छियासी दैत्य-सेनापति अपनी सेनाओं के साथ युद्ध के लिए प्रस्थान करें। कम्बु नाम वाले दैत्यों के सेनापति चौरासी सेना नामक अपनी वाहिनी से घिरे हुए यात्रा करें। पचास कोटिवीर्य-कुल के और सौ धौम्र-कुल के असुर सेनापति मेरी आज्ञा से सेना सहित कूच करें। कालक, दोर्ह्द, मौर्य और कालमेय असुर भी युद्ध के लिए तैयार होकर मेरी आज्ञा का पालन करें। भयानक शासन करने वाला राक्षसों का राजा शुंभ इस प्रकार आज्ञा दे बड़ी-बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध के लिए प्रस्थित हुआ? उसकी भयंकर सेना आती देख चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गुंजा दिया।

उसके उपरान्त भवानी मां दुर्गा के सिंह ने भी जोर-जोर से दहाडऩा प्रारंभ कर दिया। फिर अम्बिका ने घंटे के शब्द से उस ध्वनि को और भी बढ़ा दिया। धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और घंटे की ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएं गूंज उठी। उस भयंकर शब्द से काली मां ने अपने विकराल मुख को और बढ़ा लिया तथा इस प्रकार वे विजयिनी हुई।

इस प्रकार का नाद सुनकर राक्षसों की सेना ने चारों ओर से आकर चण्डिका मां, सिंह तथा काली देवी को क्रोधपूर्वक घेर लिया। इसी बीच राक्षसों के विनाश तथा देवताओं के अभ्युदय के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवों की शक्तियां जो अत्यन्त बल एवं पराक्र म से सम्पन्न थी, उनके शरीर से निकल कर उन्हीं के रूप में चण्डिका देवी के पास गई। जिस देवता का जैसा रूप, जैसा वाहन, जैसी वेष भूषा, ठीक वैसे ही साधनों से सम्पन्न हो उसकी शक्ति राक्षसों से युद्ध करने के लिए आयी।

सबसे पहले हंसयुक्त विमान पर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमन्डल से सुशोभित ब्रह्मा जी की शक्ति उपस्थित हुई जिसे ब्रह्माणी कहते हैं। महादेव की शक्ति वृषभ पर सवार हो हाथों में श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किये महानाग का कंगन पहने, मस्तक में चन्द्ररेखा से विभूषित हो वहां आ पहुंची। कार्तिकेय जी की शक्ति रूपा जगदम्बिका उन्हीें का रूप धारण किए श्रेष्ठ मयूर पर सवार होकर हाथों में शक्ति लेकर राक्षसों से युद्ध करने के लिए आई।

इसी प्रकार भगवान विष्णु की शक्ति गरूड़ पर सवार होकर शंख, चक्र , गदा, धनुष तथा खडग हाथों में लिए वहां आयी। अन्य देवों ने भी अपने रूपों में शक्तियों को भेजा।

तदन्तर उन देव शक्तियों से घिरे हुए महादेव जी ने चण्डिका से कहा-'मेरी प्रसन्नता के लिए तुम शीघ्र ही इन राक्षसों का संहार करो'। इतना सुनकर अत्यन्त भयानक और परम उग्र चण्डिका शक्ति प्रकट हुई जो सैंकड़ों तरह की आवाज करने वाली थी। उस देवी ने महादेव जी से कहा-भगवान। आप शुम्भ-निशुम्भ के पास दूत बनकर जाइए तथा दोनों से कहिए। साथ ही उनके अतिरिक्त जो भी राक्षस युद्ध के लिए वहां पर उपस्थित हों, उनको भी यही संदेश दीजिए - दैत्यो, यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो पाताल को लौट जाओ। इन्द्र को त्रिलोकी का राज्य मिल जाए तथा देवता यज्ञ भाग का उपयोग करें। यदि बल के घमंड में आकर तुम युद्ध की अभिलाषा रखते हो तो जाओ। मेरी योगिनियां तुम्हारे कच्चे मांस को खाकर तृप्त होगी।

उपस्थित राक्षस इतना सुनकर क्रोध में भर गए। जहां पर कात्यायनी थी, उस ओर बढ़े तथा तरह-तरह के हथियारों से वार करने लगे। तब देवी ने खेल-खेल में ही धनुष की टंकार की और उससे छोड़े हुए बाणों द्वारा दैत्यों के चलाए हुए बाण, शूल, शक्ति और फरसों को काट डाला। फिर काली उनके आगे होकर शत्रुओं को शूल के प्रहार से विदीर्ण करने लगी। ब्रह्माणी भी जिस ओर दौड़ती, उसी ओर अपने कमन्डल का जल छिड़क कर राक्षसों के ओज और पराक्र म को नष्ट कर देती।

इस प्रकार क्रोध में भरे हुए मातृगणों को नाना प्रकार के उपायों से बड़े-बड़े राक्षसों का मर्दन करते देख अन्य दैत्य सैनिक भाग खड़े हुए। मातृगणों से पीडि़त दैत्यों को युद्ध से भागते देख रक्तबीज नामक महादैत्य क्रोध में भरकर युद्ध करने के लिए आया। उसके शरीर से जब भी रक्त की बूंद पृथ्वी पर गिरती, तब ही उसी के समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पृथ्वी पर पैदा हो जाता। रक्तबीज हाथ में गदा लेकर इन्द्रशक्ति के साथ युद्ध करने लगा। तब महारानी ने रक्तबीज को मारा। वज्र से घायल होने पर उसके शरीर से बहुत सा रक्त गिरने लगा और उससे उसके समान रूप तथा पराक्र म वाले राक्षस पैदा होने लगे। वे सभी देवी के साथ युद्ध करने लगे।

इस प्रकार राक्षसों के उत्पन्न होने पर काली मां ने अपना मुंह फैलाना शुरू कर दिया और वहां पर फैले राक्षसों को खाने लगी। काली ने अपने मुख में रक्त लेना शुरू कर दिया। रक्त बीज ने देवी पर प्रहार किया। देवी ने अपने प्रहार से रक्त बीज को जमीन पर गिरा दिया तथा ज्यों ही वह जमीन पर गिरा, चामुन्डा मां ने उसे तुरन्त मुख में ले लिया तथा खून चूस लिया। इस प्रकार राक्षसों के दल पर देवी ने विजय पाई।

-राकेश गोयल

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