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मोक्षदायक है केदार तीर्थ की यात्रा.

मोक्षदायक है केदार तीर्थ की यात्रा.

बारह ज्योर्तिलिंगों में श्रेष्ठ केदारलिंग/केदारनाथ में साक्षात शिव निवास करते हैं। सम्पूर्ण पापों का नाश कर मोक्षदायिनी

केदार भूमि के वर्णन से धर्मशास्त्रा भरे पड़े हैं। शिव पुराण, पद्म पुराण, कर्म पुराण, स्कन्द पुराण, वाराह पुराण, सौर

पुराण, वामन पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण तथा लिंग पुराण आदि में केदार तीर्थ को मनुष्य के सम्पूर्ण पापों का नाशक और

मोक्षदायक बताया गया है।

समुद्र की सतह से 3,581 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंजुल तीर्थ पर पहुंचते ही शीत, क्षुधा, पिपासा आदि कितने ही

विध्नों के होते हुए भी किसी भी धार्मिक व्यक्ति का मन भाव समाधि में लीन हो जाता है।

केदारनाथ मंदिर के बाहरी प्रासाद में पार्वती, पांडव, लक्ष्मी आदि की मूर्तियां हैं। मंदिर के समीप हंसक कुण्ड है जहां पितरों

की मुक्ति हेतु श्राद्ध-तर्पण आदि किया जाता है। मंदिर के पीछे अमृत कुण्ड है तथा कुछ दूर रेतस कुण्ड है। ऐसा सुना

जाता है उसका जल पीने मात्र से ही मनुष्य शिव रूप हो जाता है। उसमें पारा दिखाई देता है। उसके जल में वन्हितीर्थ

विद्यमान हैं। केदारनाथ के मंदिर के पास ही उद्दय कुण्ड है जिसकी महिमा विशेष बताई जाती है।

केदारनाथ के निकट अनेक पौराणिक और धार्मिक महत्व के स्थान हैं। केदार मंदिर के पार्श्व भाग में शंकराचार्य की समाधि

भी है। मंदिर से कुछ ही दूरी पर भैरव झांप है। उसे भैरव शिला और भुकुण्ड भैरव के नाम से भी जाना जाता है जहां से

हिमालय का मनोहर दृश्य अत्यन्त नजदीक दिखाई पड़ता है। केदार क्षेत्र का रक्षक भैरव देवता को माना जाता है। यहां

भैरव का पूजन किया जाता है।

विशेष पूजन केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने के समय किया जाता है। पास में बर्फानी झील है, वहीं से

मंदाकिनी नदी का उदगम होता है। भैरव शिला के निकट एक प्राचीन गुफा है। भीमगुफा के नाम से प्रसिद्ध इस स्थान के

कुछ ही दूरी पर भीम शिला है। लोक मान्यताओं के अनुसार इस शिला पर महाबली भीम ने विश्राम किया था। केदारनाथ

से कुछ दूरी पर चोरबारी ताल है। इस ताल में महात्मा गांधी की अस्थियां विसर्जित करने के बाद यह ताल गांधी सरोवर

के नाम से प्रसिद्ध हो गया है।

इस देवभूमि में 1. केदारनाथ, 2. मध्यमहेश्वर, 3. तंगनाथ, 4. रूद्रनाथ, 5. कल्पेश्वर नामक पंच केदार के नाम से पावन

धाम हैं जिनमें केदार की अपनी अलग ही महत्ता है। मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित केदारनाथ बारह ज्योर्तिलिंगों में सबसे

महत्त्वपूर्ण और प्रमुख धाम हैं। इस पावन मंदिर में गौरी कुण्ड से 14 किमी. की पैदल यात्रा के बाद पहुंचा जाता है।

देवभूमि उत्तरांचल में केदार भी पंच केदार के रूप में मौजूद हैं। केदारनाथ के बाद अन्य जिन चार केदारों का वर्णन

धर्मशास्त्रों में आया है उनका विवरण निम्न प्रकार है।

मदमहेश्वर

पंचकेदारों में मदमहेश्वर को द्वितीय केदार माना जाता है। यह समुद्र तट से 3289 मीटर की ऊंचाई पर है। कहा जाता है

कि भगवान शिव ने यहां अपनी मधुचन्द्र रात्रि मनायी थी। यहां शिव की नाभि की आकृति का शिवलिंग स्थापित है। इसी

की पूजा मदमहेश्वर में होती है। इस पावन तीर्थ के निकट सरस्वती का उदगम स्थल भी बताया गया है। सरस्वती कुण्ड में

स्नान तर्पण और गोदान का बड़ा महत्त्व है।

तुंगनाथ

तुंगनाथ में भगवान शंकर की भुजाओं की पूजा होती है। कहा जाता है कि जो भक्ति पूर्वक तुंगनाथ का पूजन कर दक्षिणा

देता है वह हजार जन्मों तक दरिद्र नहीं होता और वह करोड़ कल्पों तक शिवलोक में वास करता है।

रूद्रनाथ

अंधक नामक दैत्य के द्वारा सभी लोकपाल और देवराज इन्द्र को भी पराजित कर जब अमरावती को भी जीत लिया तो

देवता पृथ्वी पर भटकने लगे। तब देवताओं ने यहां भगवान शिव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। रूद्रनाथ का मंदिर

गुफा रूप में है। कहा जाता है कि भगवान शिव अंधकासुर का वध करने के उपरान्त पार्वती सहित यहीं निवास करते थे।

रूद्रनाथ मंदिर में भगवान शिव के मुख की पूजा होती है। पूजा यहां ग्रीष्मकाल में ही होती है। नवम्बर से मई-जून तक

मूर्ति गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर में रहती है।

कल्पेश्वर

2134 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कल्पेश्वर मंदिर में वर्ष भर भगवान शिव की पूजा होती है। यहां देवराज इन्द्र ने दुर्वासा

ऋषि के श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की आराधना की और कल्पतरू प्राप्त किया था। परिणामतः वे पुनः

श्रीयत् हुए। तभी से इस स्थान में शिव कल्पेश्वर नाम से विख्यात हुए। यहां भगवान शिव की जटाओं की पूजा होती है।

जो व्यक्ति यहां भगवान भोलेनाथ की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करता है उसे जन्म जन्मान्तरों के पापों से मुक्ति मिल जाती

है। (उर्वशी)

-त्रिलोक चन्द्र भट्ट

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