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धर्म-गणेश, तुलसी और दूर्वा,,क्या है इनका महत्व..!

धर्म-गणेश, तुलसी और दूर्वा,,क्या है इनका महत्व..!

क्यों नहीं चढ़ती तुलसी:- ब्रह्मकल्प की बात है। नवयौवनसम्पन्न परम लावण्यवती तुलसी देवी भगवान नारायण का स्मरण करती हुई तीर्थों में भ्रमण कर रही थी। इस प्रकार वे पतित पावनी श्री गंगाजी के पावनतम तट पर पहुंची। वहां तुलसी देवी ने अत्यंत सुन्दर श्री गणेशजी को तप करते हुए देखा। सर्वथा निष्काम एवं जितेन्द्रिय पार्वतीनंदन को देखकर तुलसी देवी का मन उनकी ओर बरबस आकृष्ट हो गया। विनोद के स्वर में उन्होंने कहा-'गजवक्त्र! एकदन्त! सारे आश्चर्य आपके ही शुभ विग्रह में एकत्र हो गये हैं। किस तपस्या का फल है यह?

उमानंदन एकदन्त ने शांत स्वर में कहा - 'वत्से! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? तपश्चरण में विध्न डालना उचित नहीं। यह सर्वथा अकल्याण का हेतु होता है। मंगलमय प्रभु तुम्हारा कल्याण करें। तुलसी देवी ने कहा- 'मैं धर्मात्मज की पुत्री हूं। मनोनुकूल पति की प्राप्ति के लिये तपस्या में संलग्न हूं। आप मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लीजिये।

गणेश जी ने कहा - 'माता! विवाह बड़ा दु:खदायी होता है। उससे सुख संभव नहीं। विवाह तत्वज्ञान का उच्छेदक और संशयों का उश्वम स्थान है। तुम मेरी ओर से अपना मन हटाकर किसी अन्य पुरूष को पति के रूप में वरण कर लो। मुझे क्षमा करो। कुपित हो कर तुलसी देवी ने लंबोदर को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह अवश्य होगा।

एकदन्त गणेश ने भी तुरंत तुलसी को शाप दिया कि 'देवी! तुम्हें भी असुर पति प्राप्त होगा। उसके अनन्तर महापुरूषों के शाप से तुम वृक्ष हो जाओगी। पार्वती नंदन के अमोघ शाप के भय से तुलसी देवी सर्वाग्रपूज्य हेरम्ब की प्रार्थना करने लगी। मूषक वाहनेन प्रभु हेरम्ब ने तुलसी की स्तुति से प्रसन्न होकर कहा-देवी! तुम पुष्पों की सारभूता एवं कलांश से नारायण प्रिया बनोगी। यों तो सभी देवता तुमसे संतुष्ट होंगे किन्तु श्रीहरि के लिए तुम विशेष प्रिय होओगी। तुम्हारे द्वारा श्रीहरि की अर्चना कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करेंगे किन्तु मेरे लिये तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी। इतना कहकर भालचन्द्र गणनाथ तपश्चरणार्थ बद्रीनाथ के सन्निकट चले गये।

समय आने पर तुलसी के शाप से श्रीगणेश का ऋद्धि सिद्धि के साथ विवाह हुआ और कालान्तर में तुलसी देवी वृन्दा के नाम से दानवराज जालंधर की पतिव्रता पत्नी हुई। देवताओं और जालंधर के युद्ध के समय भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप लेकर वृन्दा को स्पर्श कर पतिव्रत धर्म को खंडित कर दिया जिससे जालंधर देवताओं द्वारा मारा गया। यह बात जब वृन्दा को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर होने का शाप दे दिया। शाप के कारण भगवान विष्णु शालिग्राम बन गए। फिर विष्णु जी ने वृन्दा को वृक्ष होने का शाप दिया और कहा कि तुम मेरी प्रिय रहोगी और तुम मेरे ऊपर चढ़ोगी तुम्हारे बिना मेरा भोग नहीं लगेगा।

एक और भी कथा आती है कि दूसरे कल्प में वृन्दा दानवराज शंखचूड़ की पत्नी हुई। शंखचूड़ भगवान् शंकर के त्रिशूल से मारा गया और उसके बाद नारायण-प्रिया तुलसी कलांश से वृक्ष भाव को प्राप्त हो गई। पुराणों में यह कथा विस्तार से वर्णित है। इसलिए श्री गणेश जी की पूजा-पाठ में तुलसी का उपयोग नहीं किया जाता।

क्यों चढ़ती है दूर्वा:- श्री गणेश जी को दूर्वा अधिक प्रिय है। गणेश पुराण में कहा गया है कि 'हरिता: श्वेतवर्णा वा पंचत्रिपत्रसंयुता:। दूर्वांकुरा मया दत्ता एकविंशतिसम्मिता:।। अर्थात् गणेशजी को हरी या सफेद, पांच या तीन पत्ती वाली दूर्वा का 21 गांठ बांधकर चढ़ाना चाहिए।

प्रत्येक व्यक्ति की यह जिज्ञासा हो सकती है कि भगवान गणेश पर दूर्वा या दूबी क्यों चढ़ाई जाती है? इससे क्या होता है व इसके पीछे वास्तविकता क्या है? आइये जानें प्रमाण से....

भगवान गणेश की प्रतिमा पर उनकी सूंड में दूर्वा का गुच्छा लगा रहता है। दूर्वा की माला पहने हुए श्री गणेश भगवान अपने अलग ही अंदाज में दिखते हैं। श्रीगणेश जी की पूजा-पाठ में भले ही कुछ हो या न हो किन्तु दूर्वा का होना आवश्यक रहता है।

श्री गणेशजी को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है, इस संबंध में पुराणों में एक कथा आती है - एक समय पृथ्वी पर अनलासुर नामक राक्षस ने भयंकर उत्पात मचा रखा था। वह भगवद् भक्ति व ईश्वर आराधना करने वाले ऋषि-मुनियों और निर्दोष लोगों को जिंदा निगल जाता था। पृथ्वी के साथ-साथ अनलासुर के अत्याचार स्वर्ग और पाताल तक भी फैलने लगे थे।

देवराज इन्द्र ने अनलासुर से कई बार युद्ध किया किन्तु उन्हें हमेशा पराजय का सामना करना पड़ा। अनलासुर से त्रस्त होकर समस्त देवता भगवान शिव जी के पास गए। शिवजी ने देवताओं से कहा कि अनलासुर को सिर्फ गणेश ही परास्त कर सकते है। यह अस्त्र-शस्त्र से परास्त होने वाले नहीं है। गणेश का पेट बड़ा है, इसलिए वे अनलासुर को पूरा निगल लेंगे। निगलने पर ही अनलासुर का खात्मा हो सकेगा।

देवताओं ने गणेश भगवान की प्रार्थना कर उन्हें प्रसन्न किया। गणेशजी ने अनलासुर का पीछा किया और उनसे युद्धकर उसे निगल गए। अनलासुर को निगलते ही उनके पेट में भारी जलन होने लगी। गणेशजी की ज्वाला शांत करने के लिए अनेक उपाय किये गये किन्तु सारे व्यर्थ गए। जब यह बात श्री कश्यप ऋषि तक पहुंची तो वे तुरंत कैलाश पर्वत पर गए। कश्यप ऋषि बड़े ही विद्वान और जानकार थे। उन्होंने 21 दूर्वा एकत्रित करके एक गांठ तैयार की। दूर्वा की यह वह गांठ गणेश जी को खिलाते ही उनके पेट की ज्वाला तुरंत शांत हो गई।

इसी कारण आज भी गणेश भगवान को दूर्वा अर्पित की जाती है। इस दूर्वा के बिना गणेश भगवान की पूजा ही नहीं होती। गणेश मंदिरों में दूर्वा की ही माला अधिक देखने को मिलता हैं। दूर्वा अर्पण से गणेश जी प्रसन्न होते है और भक्तों के दु:ख संताप दूर कर मनवांछित फल प्रदान करते हैं।

- श्री चन्द्रभूषण शुक्ला चेतन'

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