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रामायण के पात्र: मनुशतरूपा भगवत जननी कौशल्या

रामायण के पात्र: मनुशतरूपा भगवत जननी कौशल्या

दशरथ की सबसे बड़ी रानी कौशल्या का रामायण महाकाव्य में नारी पात्रों में,सीता के बाद सबसे ज्यादा सम्मानजनक व महत्त्वपूर्ण स्थान है। कौशल्या का यह नाम उन्हें कौशल प्रदेश के राजा के घर जन्म लेने की वजह से पड़ा।

कौशल्या को राजा दशरथ के लिए अपनी सबसे बड़ी पुत्रवधु के रूप में दशरथ के पिता महाराजा अज ने इसलिये चुना था क्योंकि एक तो वह कौशल्या के रूप सौम्यता व गुणों से बेहद प्रभावित थे।

वहीं ऐसा करके उन्होंने अयोध्या व कौशल प्रदेश को एक ऐसे सम्बन्ध में बांध दिया था जो कि तात्कालिक परिस्थितियों में दोनों ही राज्यों को दैत्यों के खिलाफ खड़े होने के लिए एक सुरक्षाचक्र प्रदान करता था।

उस समय ऐसा करना एक बहुत ही आम बात थी कि राजा महाराजा अपनी बेटियों को अपने राजसंबंधों के लिये अपने लिये सहयोगी राज्यों के राजकुमारों के साथ विवाह बंधन में बांध देते थे। इस प्रकार से कौशल्या दो राज्यों के बीच एक सेतु बंध के रूप में अयोध्या में आई।

कौशल्या के बारे में वाल्मीकी रामायण में उल्लेख मिलता है कि पूर्व जन्म में जब वे मनुशतरूपा के नाम से जानी जाती थी, उन्होंने अपने तप से भगवान विष्णु को प्रसन्न किया जिसके फलस्वरूप भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि उन्हें अगले जन्म में उनके अवतार के रूप में जन्म लेने वाले श्रीराम की माता होने का सौभाग्य मिलेगा और उसी वरदान के चलते वे कौशल प्रदेश की राजकुमारी के रूप में पैदा हुई और उनका विवाह राजा दशरथ के साथ हुआ जो पूर्व जन्म में महाराजा तुंगध्वज थे और उन्हें भी भगवान विष्णु ने ही अगले जन्म में अपना पिता होने का वरदान दे रखा था।

कौशल्या न केवल राजा दशरथ की ज्येष्ठतम रानी थी वरन वे अत्यंत ही संत स्वभाव की स्त्री भी थी। वे राजा दशरथ के प्रति पूर्णतया समर्पित तो थी ही, उनकी हर बात को पूरा सम्मान भी देने वाली पतिव्रता स्त्री थी।

यही कारण था कि न चाहते हुए भी राम को वनवास मिलने पर भी वे राजा दशरथ के वचनों के पालन को सन्नद्ध रही। वे राम से इतना स्नेह करती थी कि जब उन्हें उनके वनवास की खबर मिली तो वे किसी कटे हुए पेड़ की तरह जमीन पर गिर पड़ी और अचेत हो गई। उनकी जल बिन मछली जैसी हालत हो गई

नयन सजल तन थर थर कांपी। माजहि खाय मीन जनुं मापी।।

राम के वनवास एवम् राजमर्यादा के भंग होने से वे बुरी तरह आहत हुई और कहा जाता है कि उन्होंने राजा दशरथ को इसी क्र ोध के चलते काफी भला बुरा भी कह दिया पर जब राजा ने अपनी असहाय स्थिति उन्हें बताई तो वे अपने व्यवहार के लिए बहुत ही शर्मिंदा हुई और उन्होंने राजा से बार बार माफी भी मांगी।

राम के वन जाने के दृढ़ निश्चय को देखकर कौशल्या ने भी उन्हें पिता की आज्ञा पालन करने को ही कहा। राम को वन जाने की आज्ञा देकर कौशल्या की दयनीय हालत हो जाती है। रामचरित मानस में लिखा है

बहुबिधि बिलंप चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहु जानि।।

दारुन दुसह दाहु उर व्यापा। बरन न जाहिं बिलाप कलापा।।

कौशल्या केवल राम को ही नहीं अपितु केकैयी के पुत्र भरत को भी राम जितना ही प्यार करती थी इसलिए जब वे अपने ननिहाल केकैय प्रदेश से वापस आये और उन्हें राम के वनवास का समाचार मिला तो वे केकैयी पर बहुत नाराज हो गए तथा उन्होंने घोषणा कर दी कि वे न तो राजगद्दी पर बैठेंगे और न ही केकैयी को कभी माता के सम्बोधन से बुलाएंगे।

तब कौशल्या ने ही उन्हें मनाया व कहा कि राम को वनवास मिलने के पीछे न तो उनका कोई दोष है और न ही उनकी माता का अपितु यह सब तो विधाता की पहले ही रची हुई लीला थी जिसने केकैयी को उनके पूर्व जन्म के पापों के चलते यह अपयश दिलवाया है और उन्होंने भरत को भी अपने सीने से वैसे ही लगाया जैसे कि वे राम को लगाती थीं।

कौशल्या के कहने पर ही भरत ने वशिष्ठ गुरू की सलाह पर अयोध्या पर राज करना स्वीकार किया था, इसका उल्लेख वाल्मीकी द्वारा लिखित रामायण में मिलता है। श्रीराम के द्वारा कौशल्या को एक पतिव्रता स्त्री के कर्तव्यों के बारे दिये गये उपदेशों से कौशल्या इतनी प्रभावित हुई कि आजीवन उन्होंने उसका पालन किया और जब सीता ने यह कहते हुए राम के ही साथ वन जाने की इच्छा जताई कि जैसे चन्द्रमा के बिना चांदनी का जिंदा रहना असंभव है वैसे राम के वन जाने पर वे अकेले जीवित नहीं रह पाएंगीं तो स्वयं कौशल्या ने आगे बढ़कर अपने दु:ख के बावजूद उन्हें वन जाने की इजाजत दी थी व उन्हें उपदेश दिया था कि एक पतिव्रता स्त्री का हर विपरीत परिस्थिति में अपने पति का साथ देना ही सच्चा धर्म है जिसका सीता ने भी जी जान से पालन कर संसार में नाम कमाया ।

कौशल्या ने राम के वन जाने के दु:ख में अति शोकाकुल राजा दशरथ को भी समझाया कि वे धैर्यपूर्वक इस दु:ख को भाग्य मान कर सहन करें व अपने राजधर्म को निभाएं। विधवा होने के बाद भी कौशल्या ने अपने दु:ख में डूबने की बजाय महल में सबको संभाला जो एक बड़ी बहादुरी का काम था। वे केकैयी की तरह न तो बहुत महत्वाकांक्षी थीं व न ही उन्होंने भरत के राजतिलक में कोई बाधा पैदा की बल्कि वे भरत के साथ वैसी ही स्नेहशील बनीं रहीं जैसे कि पहले थी।

तुलसीदास जी ने अयोध्याकांड में राम के बाल रूप पर मुग्ध कौशल्या का मनोहर चित्रण किया जो उन्हें एक वात्सल्यमयी मां सिद्ध करता है।

बेशक राम की माता के रूप में तो कौशल्या बेजोड़ हैं ही साथ ही साथ एक रानी, राजमाता,पत्नी, विमाता, सास, जेठानी व कुलवधू सारे ही रूपों में कौशल्या का चरित्र भारतीय समाज को एक अनुकरणीय आदर्श देता है।

- घनश्याम बादल

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