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धर्म संस्कृति: भाव के भूखे हैं भगवान

धर्म संस्कृति: भाव के भूखे हैं भगवान

एक बहुत ही कंजूस प्रवृत्ति का बनिया एक संत के पास गया और बोला, 'मैं भगवान का नाम लेना चाहता हूं, महाराज! सेवा पूजा करना चाहता हूं किंतु एक दमड़ी का भी खर्चा न हो, ऐसा कोई उपाय बताएं भक्ति का।

संत ने समझाते हुए कहा, 'अरे भाई, भगवान कब तुमसे रूपया-पैसा चाहता है। उसे तो चाहिए सच्ची भक्ति और वह सच्चे प्यार से मिलती है। पैसे के बिना यदि भक्ति हो सकती है तो भला उस कंजूस बनिया को भक्ति से क्या परहेज करना? बस खुशी-खुशी लग गया राम-नाम जपने में। उठते-बैठते, खाते-पीते दिन-रात वह ईश्वर का नाम जपता रहा और नाम-स्मरण में इतना लीन हो जाता कि परमानंद की अनुभूति से उसका चेहरा दमकने लगा। एक दिन बनिए को ख्याल आया कि भगवान को भोग-प्रसाद भी लगाना चाहिए और यह सोचकर उसने एक दूध का भरा लोटा भगवान के सामने रख दिया तथा शक्कर भी खूब सारी डाली और आंखें बंद कर भगवान से प्रार्थना करने लगा कि, 'हे प्रभु! भोग प्रसाद ग्रहण कीजिए।' इतने में उसे ख्याल आता है कि दूध में शक्कर कुछ ज्यादा मात्र में डाल दी है। सोचा थोड़ी सी शक्कर निकाल लेता हूं और जैसे ही दूध के लोटे में हाथ डाला शक्कर निकालने के लिए तो दंग रह गया। देखता है, लोटे का सारा दूध गायब। बनिया समझ गया कि भगवान तो उससे भी ज्यादा उस्ताद निकले। हाथ आया हुआ सब कुछ हजम कर गये और भगवान बनियों का भी बनिया रहा।

चूंकि सच्ची भक्ति का प्रतिफल था यह कि भगवान ने प्रसाद ग्रहण किया और यह जानकर आनंद विभोर हो गया, उसका रोम-रोम पुलकित हुआ क्योंकि स्वयं भगवान ने प्रगट होकर सच्ची भावना व श्रद्धा से उसके द्वारा लगाया गया प्रसाद स्वीकार किया।

गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं 'भाव कुभाव, अनख-आलस हूं, नाम जपत मंगलम दसों दिशी होहूं!' भाव से, कुभाव से, बेमन से या आलस से भी, और तो और भूले से भी भगवान के नाम का स्मरण करने से दसों दिशाओं में मंगल होता है। हमने उपरोक्त दृष्टांत में भी देखा कि किस प्रकार से एक कंजूस बनिया मात्र सच्ची भावना से भगवान का भक्त हुआ और भाव के भूखे भगवान प्रसन्न हुए। भगवान स्वयं कहते हैं, -भाव का भूखा हूं मैं, और भाव ही इक सार है। भाव बिना सर्वस्व भी दें तो मुझे स्वीकार नहीं। ऐसे परमकृपालु भगवान की भक्ति को प्राप्त करने के लिए सचमुच में अपने हृदय के सुकोमल भावों के पुष्प अर्पित करने होंगे। शबरी ने झूठे बैर खिलाए मात्र सच्चे भाव के कारण और दुर्योधन का मेवा त्याग कर विदुर के यहां केले के छिलके खाए।

विदुरजी भाव के सागर में इतना डूब गए कि अपने भगवान को अपने ही हाथों से खिलाने का सुख पाने हेतु केले की गिरी फेंक रहे हैं और छिलका थमाते हैं भगवान को और वे खा रहे हैं। जब होश आता है तो पछतावा करते हैं लेकिन भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, Óकोई बात नहीं, मैंने केले समझकर बड़े ही आनंद से खाया और तृप्त हुआ तुम्हारी भक्ति-भावना से।'

तो मित्रो, 'भगवान भाव के भूखे हैं', यह कभी नहीं भूलना चाहिए और अपनी सच्ची श्रद्धा, आस्था, विश्वास, प्रेम के पुष्प अर्पित करना चाहिए। दिखावे, ढोंग व आडम्बर से बचना चाहिए क्योंकि भगवान को धन नहीं चाहिए। वे खुद लक्ष्मीपति हैं, अन्न नहीं चाहिए क्योंकि वे खुद उपजाते हैं, वस्त्र नहीं चाहिए क्योंकि अम्बार लगा हुआ है वस्त्रों का। उन्हें तो सिर्फ सच्चा प्यार, सच्चा भाव चाहिए जिसके वे सदैव भूखे हैं और इसी आधार पर भक्तों का कल्याण करते हैं।

- आर.डी. अग्रवाल 'प्रेमी'

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