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बाल कथा: उल्लू गाथा

बाल कथा: उल्लू गाथा

हमारे देश में उल्लू को लक्ष्मी वाहन कहा जाता है और प्राय: उल्लू को मूर्ख भी कहते हैं। क्या कारण है लक्ष्मी वाहन को मूर्ख की उपाधि दे दी गई है। सूर्य के प्रकाश में उल्लू को कुछ नजर नहीं आता, वह प्रकाश सहन नहीं कर सकता। इससे स्पष्ट है कि जो लोग धन के पद में उन्मत हो जाते हैं उनमें ज्ञान, बुद्धि की कमी रहती है।

वे जो ज्ञान और लौकिक व्यवहार रूपी रोशनी से कतराते हैं। उनकी गतिविधियां उल्लू के समान हो जाती हैं लेकिन लक्ष्मी जी नहीं चाहती कि उनका कोई भक्त धन के मद में अंधा या विवेकहीन हो जाये। यदि उल्लू की बनावट के बारे में सोचा जाय तो यह देखने में अजीबोगरीब व अन्य पक्षियों से अलग दिखाई देता है। इसका स्वभाव अपने आप में निराला है। एक खास बात और उल्लू में है कि उड़ते समय उसके पंख आवाज नहीं करते। परिणाम स्वरूप अपने शिकार को शीघ्र ही पकड़ लेता है।

इसकी गर्दन अन्य पक्षियों की तरह नहीं बल्कि चारों ओर घूम जाती है। उल्लू को साधारणतया लोग अशुभ मानते हैं। रोम के लोग इससे इतनी घृणा करते हैं कि यदि शहर में किसी कोने में दिखाई दे दिया जाये तो इसे पकड़कर जिन्दा जला देते हैं। हमारे देश में इसे प्रेमवश 'बूढ़ा खूसट' कहते हैं।

उल्लू के जन्म तथा इसके सम्बन्ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। थाईलैंड की एक लोककथा के अनुसार पहले उल्लू बहुत ही सीधा, ईमानदार और मिलनसार था। तब इसे दिन में सब कुछ नजर आता था लेकिन एक दिन इससे भारी गलती हो गई। जिस वृक्ष में उसका निवास था, उसी में रह रही एक चिडिय़ा के अण्डे वह खा गया।

सांझ ढले जब चिडिय़ा आई तो उससे पूछा-ताछ की। दुर्भाग्यवश उसी समय उसे दो तीन उलटियां हो गई जिससे उसके झूठ की कलाई खुल गई। क्रोधित चिडिय़ा ने श्राप दे दिया कि दिन में तुम्हें कुछ भी नजर नहीं आएगा ताकि तुम किसी के बाल बच्चे का अहित न कर सको।

इसी प्रकार श्रीलंका की लोककथा बहुत ही मार्मिक है। एक दुष्ट प्रकृति के पति को अपनी पत्नी पर सदैव सन्देह बना रहता था। एक दिन उसकी पत्नी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के लिए बाहर गई। इससे पति का सन्देह और ज्यादा बढ़ गया।

क्रोधवश पत्नी के घर वापस आने पर उसने अपने बच्चे का मांस मिठाई में मिलाकर उसे परोस दिया। बाद में पत्नी को इसकी भनक मिली तो वह आत्महत्या कर बैठी।

अपने भक्त पर किये अत्याचार से लक्ष्मी जी व्याकुल और क्रोधित हो गई। उसने पति को उल्लू बनाकर अपनी सवारी कर ली। कहते हैं तब से उल्लू को अपने कृत्य पर अफसोस है। जब-जब उसे अपनी पत्नी और बच्चे की याद सताती है वह रात को जोर-जोर से रोता है।

उल्लू को तंत्रशास्त्र के प्रयोगों का माध्यम भी बनाया जाता है। घर में प्राय: छोटे बच्चों को इसके नाखूनों या पंखों के ताबीज पहनाए जाते हैं। यह भी अंधविश्वास है कि उल्लू अपने बच्चों की आंखें पारस पत्थर से खोलकर उसे वहीं फेंक देता है। कई शिकारी वनों में इसी पारस पत्थर की खोज में इनके घोसलों पर पहरा देते हैं। इसके सभी अंग प्राय: औषधियों के काम आते हैं। ऐसी है उल्लू की धार्मिक कथा। यह सब जानने के बाद मुझे विश्वास है कि आप किसी व्यक्ति को उल्लू नहीं कहेंगे।

- वीरेश जाटव

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