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पर्यटन/ तीर्थस्थल: कलियुग का पवित्र धाम है जगन्नाथपुरी

पर्यटन/ तीर्थस्थल: कलियुग का पवित्र धाम है जगन्नाथपुरी

हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं में चारों धामों को एक युग का प्रतीक माना जाता है। इसी प्रकार कलियुग का पवित्र धाम जगन्नाथ पुरी माना गया है। यह भारत के पूर्व में उड़ीसा राज्य में स्थित है जिसका पुरातन नाम पुरुषोत्तम पुरी, नीलांचल, शंख और श्रीक्षेत्र भी है। उड़ीसा या उत्कल क्षेत्र के प्रमुख देव भगवान जगन्नाथ हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा राधा और श्रीकृष्ण का युगल स्वरूप है। श्रीकृष्ण, भगवान जगन्नाथ के ही अंश स्वरूप हैं, इसलिए भगवान जगन्नाथ को ही पूर्ण ईश्वर माना गया है।

जगन्नाथ मंदिर का 4,00,000 वर्ग फुट में फैला है और चारदीवारी से घिरा है। कलिंग शैली के मंदिर स्थापत्यकला, और शिल्प के आश्चर्यजनक प्रयोग से परिपूर्ण, यह मंदिर, भारत के भव्य स्मारक स्थलों में से एक है। मुख्य मंदिर वक्र रेखीय आकार का है जिसके शिखर पर भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र मंडित है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है। मंदिर के भीतर आंतरिक गर्भगृह में मुख्य देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

यह भाग इसे घेरे हुए अन्य भागों की अपेक्षा अधिक वर्चस्व वाला है। इससे लगे घेरदार मंदिर की पिरामिडाकार छत और लगे हुए मण्डप, अट्टालिका रूपी मुख्य मंदिर के निकट होते हुए ऊंचे होते गये हैं। यह एक पर्वत को घेरे हुए अन्य छोटी पहाडिय़ों, फिर छोटे टीलों के समूह रूपी बना है। मुख्य भवन एक 20 फुट ऊंची दीवार से घिरा हुआ है तथा दूसरी दीवार मुख्य मंदिर को घेरती है। एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तंभ, मुख्य द्वार के ठीक सामने स्थित है। इसका द्वार दो सिंहों द्वारा रक्षित हैं।

पुरी की मूर्ति, स्थापत्य कला और समुद्र का मनोरम किनारा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। कोणार्क का अद्भुत सूर्य मंदिर, भगवान बुद्ध की अनुपम मूर्तियों से सजी धौलागिरि और उदयगिरि की गुफाएं, जैन मुनियों की तपस्थली खंड-गिरि की गुफाएं, लिंग-राज, साक्षी गोपाल और भगवान जगन्नाथ के मंदिर दर्शनीय है। पुरी और चंद्रभागा का मनोरम समुद्री किनारा, चंदन तालाब, जनकपुर और नंदनकानन अभयारण्य बड़ा ही मनोरम और दर्शनीय है।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा का शुभारंभ होता है। उड़ीसा में मनाया जाने वाला यह सबसे भव्य पर्व होता है। पुरी के पवित्र शहर में इस जगन्नाथ यात्रा के इस भव्य समारोह में भाग लेने के लिए प्रतिवर्ष दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु यहां पर आते हैं। यह पर्व पूरे नौ दिन तक जोश एवं उत्साह के साथ चलता है।

भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति को उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की छोटी मूर्तियाँ को रथ में ले जाया जाता है और धूम-धाम से इस रथ यात्रा का आरंभ होता है। यह यात्रा पूरे भारत में विख्यात है। जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा का पर्व आषाढ़ मास में मनाया जाता है। इस पर्व पर तीन देवताओं की यात्र निकाली जाती है। इस अवसर पर जगन्नाथ मंदिर से तीनों देवताओं के सजाये गये रथ खींचते हुए दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं और नवें दिन इन्हें वापस लाया जाता है। इस अवसर पर सुभद्रा, बलराम और भगवान श्री कृष्ण का पूजन नौं दिनों तक किया जाता है।

इन नौ दिनों में भगवान जगन्नाथ का गुणगान किया जाता है। एक प्राचीन मान्यता के अनुसार इस स्थान पर आदि शंकराचार्य जी ने गोवर्धन पीठ स्थापित किया था। प्राचीन काल से ही पुरी संतों और महात्माओं के कारण अपना धार्मिक, आध्यात्मिक महत्त्व रखता है। अनेक संत-महात्माओं के मठ यहां देखे जा सकते है। जगन्नाथ पुरी के विषय में यह मान्यता है कि त्रोता युग में रामेश्वर धाम पावनकारी अर्थात कल्याणकारी रहे, द्वापर युग में द्वारिका और कलियुग में जगन्नाथपुरी धाम ही कल्याणकारी है। पुरी भारत के प्रमुख चार धामों में से एक धाम है।

ऐसे होती है पुरी की श्री जगन्नाथ रथ यात्रा -

जगन्नाथ जी का यह रथ 45 फुट ऊंचा होता है। भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे अंत में होता है और भगवान जगन्नाथ क्योंकि भगवान श्री कृष्ण के अवतार हैं, अत: उन्हें पीतांबर अर्थात पीले रंगों से सजाया जाता है। पुरी यात्रा की ये मूर्तियां भारत के अन्य देवी-देवताओं की तरह नहीं होती है।

रथ यात्र में सबसे आगे भाई बलराम का रथ होता है जिसकी ऊंचाई 44 फुट ऊंची रखी जाती है। यह रथ नीले रंग का प्रमुखता के साथ प्रयोग करते हुए सजाया जाता है। इसके बाद बहन सुभद्रा का रथ 43 फुट उंचा होता है। इस रथ को काले रंग का प्रयोग करते हुए सजाया जाता है। इस रथ को सुबह से ही सारे नगर के मुख्य मार्गों पर घुमाया जाता है और रथ मंद गति से आगे बढ़ता है। सायंकाल में यह रथ मंदिर में पहुंचता है और मूर्तियों को मंदिर में ले जाया जाता है।

यात्र के दूसरे दिन तीनों मूर्तियों को सात दिन तक यही मंदिर में रखा जाता है और सातों दिन इन मूर्तियों का दर्शन करने वाले श्रद्वालुओं का जमावड़ा इस मंदिर में लगा रहता है। कड़ी धूप में भी लाखों की संख्या में भक्त मंदिर में दर्शन के लिये आते रहते हैं। प्रतिदिन भगवान को भोग लगने के बाद प्रसाद के रुप में गोपाल भोग सभी भक्तों में वितरित किया जाता है।

सात दिनों के बाद यात्रा की वापसी होती है। इस रथ यात्रा को बड़ी बड़ी रस्सियों से खींचते हुए ले जाया जाता है। यात्र की वापसी भगवान जगन्नाथ की अपनी जन्म भूमि से वापसी कहलाती है। इसे बाहुडा कहा जाता है। इस रस्सी को खींचना या हाथ लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।

विश्व की सबसे बड़ी रसोई है ये

1- जगन्नाथ मंदिर का एक बड़ा आकर्षण यहां की रसोई है। यह रसोई विश्व की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है। यह मंदिर के दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है। इस रसोई में भगवान जगन्नाथ के लिए भोग तैयार किया जाता है।

2- इस विशाल रसोई में भगवान को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए लगभग 500 रसोइए तथा उनके 3०० सहयोगी काम करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस रसोई में जो भी भोग बनाया जाता है, उसका निर्माण माता लक्ष्मी की देखरेख में ही होता है।

3- यहां बनाया जाने वाला हर पकवान हिंदू धर्म की पुस्तकों के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही बनाया जाता है। भोग पूर्णत: शाकाहारी होता है। भोग में किसी भी रूप में प्याज व लहसुन का भी प्रयोग नहीं किया जाता। भोग निर्माण के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है।

4- रसोई के पास ही दो कुएं हैं जिन्हें गंगा व यमुना कहा जाता है। केवल इनसे निकले पानी से ही भोग का निर्माण किया जाता है। इस रसोई में 56 प्रकार के भोगों का निर्माण किया जाता है। रसोई में पकाने के लिए भोजन की मात्र पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी यह व्यर्थ नहीं जाएगी चाहे कुछ हजार लोगों से 20 लाख लोगों को खिला सकते हैं।

5- मंदिर में भोग पकाने के लिए 7 मिट्टी के बर्तन एक दूसरे पर रखे जाते हैं और लकड़ी पर पकाया जाता है। इस प्रक्रि या में सबसे ऊपर रखे बर्तन की भोग सामग्री पहले पकती है फिर क्र मश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकते जाते हैं।

-पंडित 'विशाल' दयानन्द शास्त्री

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