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चिंतन: दशावतार में निहित है मानव जाति के विकास की रूपरेखा

चिंतन: दशावतार में निहित है मानव जाति के विकास की रूपरेखा

हम कई बार कई परंपराओं और रूढिय़ों को लेकर अत्यंत भावुक हो जाते हैं। कई घिसी-पिटी परंपराओं को निरर्थक ढोए चले जा रहे हैं। तर्क होता है कि यह तो हमेशा से ही हमारे यहां होता आया है। संभव है इस हमेशा का जीवन काल कितना है, इससे हम भली-भाँति परिचित भी न हों।

इस हमेशा को जानने के लिए मानव सभ्यता व संस्कृति के इतिहास को जानना तथा मानव सभ्यता व संस्कृति के इतिहास को जानने के लिए मानव जाति का इतिहास जानना अत्यंत ज़रूरी है। प्रश्न उठता है कि मानव जाति का इतिहास कितना पुराना है? मनुष्य जीवन कब अस्तित्व में आया?

वैज्ञानिकों के अनुसार हमारी पृथ्वी पाँच अरब साल पुरानी है। इस पाँच अरब साल के पूर्वाद्र्ध में अर्थात् दो-तीन अरब साल तक तो हमारी धरती पर किसी प्रकार के जीव-जंतु थे ही नहीं। फिर करोड़ों साल तक केवल वनस्पतियां और जानवर ही अस्तित्व में आए। मनुष्य ने लगभग पाँच लाख साल पहले जन्म लिया और विकास की सीढिय़ां पार करते हुए वर्तमान विकसित अवस्था में पहुँचा। इस विकास के क्र म में कोई दस हज़ार साल पहले मनुष्य ने बस्तियां बसाना शुरू किया। दस हज़ार साल पहले या अपने प्रारंभिक दौर में पांच लाख साल पहले वह किस अन्य रूप से तत्कालीन उस रूप में आया होगा, इस पर भी विचार कर लेना चाहिए।

यह सर्वविदित है कि मनुष्य के पूर्वज बंदर थे यानी बंदरों की किसी प्रजाति विशेष के रूपांतरण से ही मनुष्य जाति के विकास का प्रारंभ होता है। उस प्रजाति का विकास भी अनायास नहीं हो गया होगा। वह भी निश्चित रूप से किसी अन्य प्रजाति से विकसित हुई होगी।

वास्तव में धरती पर जीवन की शुरूआत एक कोशिकीय जीव से हुई और वह भी जल में। जल में सबसे पहले एक कोशिकीय जीव अस्तित्व में आए और फिर बहुकोशिकीय जीव। उन्हीं के विकास के परिणाम स्वरूप पहले जल में और बाद में धरती पर अनेकानेक जीवों का विकास हुआ। धरती पर डायनासॉर जैसे विशालकाय प्राणियों का अस्तित्व में आना और विलुप्त हो जाना भी इसी कड़ी का एक भाग है। हमारे पुराणों में वर्णित दशावतार मनुष्य की विकास प्रक्रि या का ही प्रतीकात्मक वर्णन है।

हमारे पुराणों में दशावतार की कल्पना की गई है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि, ये दस विष्णु के अवतार माने गए हैं। कहीं-कहीं बुद्ध के स्थान पर बलराम का नाम भी आता है। इस प्रकार मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, कृष्ण व कल्कि आदि क्र मश: दस अवतारों की कल्पना की गई है। वास्तव में दशावतार मनुष्य के विकास की अवस्थाएँ ही हैं।

विज्ञान द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि सृष्टि का विकास अथवा जीवन का प्रारंभ जल से हुआ। प्रथम अवतार मत्स्य एक जलीय जंतु है। यह मनुष्य के विकास की भी प्रथम अवस्था है। द्वितीय अवतार कूर्म या कच्छप एक ऐसा प्राणी है जो जल और थल दोनों में रह सकता है लेकिन तृतीय अवतार वराह या सूकर केवल थल में ही रह सकता है। यह जीवन के जल से थल की ओर विकास की ओर संकेत करता है। मनुष्य आज भी विकास कर रहा है लेकिन एक जानवर से मनुष्य बनने के बीच दो ऐसे अवतार भी हैं जो पूर्ण रूप से मनुष्य नहीं हैं।

चतुर्थ अवतार नृसिंह आध पशु है तो आध मनुष्य, वहीं पंचम अवतार वामन भी मनुष्य के क़द के बराबर नहीं ठहरता। छठा अवतार परशुराम राम से पूर्व की अवस्था कही जा सकती है। जब परशुराम की नकारात्मकता से छुटकारा मिलता है, तभी राम की सकारात्मकता का उदय होता है। सातवें अवतार राम यद्यपि एक आदर्श पुरुष हैं लेकिन फिर भी आठवें अवतार कृष्ण जिन कलाओं से युक्त हैं, राम में उनका अभाव है।

राम का विकास कृष्ण के रूप में होता है और कृष्ण का नौवें अवतार बुद्ध के रूप में लेकिन फिर भी मनुष्य के विकास की अनंत संभावनाओं से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। कल्कि के रूप में उन्हीं अनंत संभावनाओं की तलाश निहित है।

- सीताराम गुप्ता

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