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नाम की महिमा

नाम की महिमा

एक बहुत उच्च कोटि के भगवत प्रेमी नामनिष्ठ महात्मा थे। उनके साथ उनका एक शिष्य रहता था। एक दिन की बात है कि वे महात्मा कहीं बाहर गये हुए थे। उसी समय उनकी कुटिया पर एक व्यक्ति आया और उसने पूछा-महात्मा जी कहां हैं?

शिष्य ने कहा-गुरू जी तो किसी कार्यवश बाहर गये हैं। आपको कोई काम हो तो कहिये। आगतुंक ने कहा-मेरा लड़का बहुत बीमार है, उसी के लिए मैं औषधि लेने आया था। महात्मा जी की अनुपस्थिति में आप ही कोई उपाय बताने की कृपा करें।

शिष्य ने उत्तर दिया-एक बहुत सरल उपाय है कि राम नाम को तीन बार लिखकर आप उसे धोकर पिला दें। बस, इसी से आपके लड़के को आराम हो जायेगा। आगंतुक अपने घर चला गया।

दूसरे दिन वह व्यक्ति बड़ी प्रसन्न मुद्रा में महात्मा जी की कुटिया पर आया। उस समय महात्मा जी वहां उपस्थित थे। उनके चरणों में प्रणाम करके उसने विनम्र शब्दों में हाथ जोड़कर कहा-महात्मा जी आपके शिष्य तो सिद्ध पुरूष हैं। कल की बात है मैं यहां आया था उस समय आप कहीं बाहर गये थे। केवल ये आपके शिष्य थे। आपकी अनुपस्थिति में इन्हीं से मैंने अपने प्रिय पुत्रा की रोग-निवृत्ति के लिये उपाय पूछा। तब इन्होंने बतलाया कि तीन बार रामनाम लिखकर उसे धोकर पिला दो। मैंने घर जाकर ठीक उसी प्रकार किया और महान आश्चर्य एवं हर्ष की बात है कि इस प्रयोग के करते ही लड़का तुरंत उठ बैठा मानो उसे कोई रोग हुआ ही न हो।

यह सुनकर महात्मा अपने शिष्य पर बड़े रूष्ट हुए और उनके हित के लिए क्रोध का नाट्य करते हुए बोले-अरे मूर्ख, इस साधारण सी बीमारी के लिए तूने राम नाम का तीन बार प्रयोग करवाया। तू नाम की महिमा तनिक भी नहीं जानता। अरे, एक बार ही नाम का उच्चारण करने से अनन्त कोटि पापों का और भवरोग का नाश हो जाता है। तू इस आश्रम में रहने के योग्य नहीं, अत: जहां तेरी इच्छा हो चला जा।

यह सुनकर शिष्य को अपनी भूल का अहसास हुआ और शिष्य की आंखों में आंसू आ गये। वह गुरूदेव से बहुत अनुनय-विनय करते हुये उनके चरणों में गिर गया। संत तो नवनीत-हृदय होते ही हैं। ऊपर से भी पिघल गये और उसके अपराध को क्षमा कर उसे अपने हृदय से लगा लिया।

-कर्मवीर अनुरागी

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