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भारतीय रीति-रिवाज पूर्ण रुप से वैज्ञानिक..जनेऊ धारण करने के हैं वैज्ञानिक आधार

भारतीय रीति-रिवाज पूर्ण रुप से वैज्ञानिक..जनेऊ धारण करने के हैं वैज्ञानिक आधार


प्राचीन समय से ही भारत परंपराओं, रीति-रिवाजों और संस्कृति का देश रहा है। वास्तव में भारत धर्म, मानव सभ्यता के विकास और नैसर्गिग सम्पदा को संरक्षण देने का आधार स्तंभ है। हमारी संस्कृति में जितने भी अनुष्ठान और रीति-रिवाज हैं, उन सभी का आधार कहीं न कहीं वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। धर्म को सूक्ष्मता से जानने का यदि प्रयास करें तो धर्म का मूल अर्थ जो धारण किया जाए वही धर्म है। हमारे रीति रिवाज, धार्मिक कार्य या कोई भी संस्कार योग्य कार्य का कोई न कोई वैज्ञानिक कारण है। इन मान्यताओं एवं आस्थाओं का वैज्ञानिक आधार हमारे महर्षियों द्वारा पूर्व में अनुसंधान द्वारा निर्धारित किया जा चुका है। इस आलेख में हम यही स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा हैं-

जनेऊ धारण करने का वैज्ञानिक आधार क्या हैं-

हिंदू धर्म में पहले के समय की बात करें तो शिक्षा ग्रहण करने से पहले यज्ञोपवीत होता था। पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह

से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। यज्ञोपवीत धारण करने के वैज्ञानिक आधार भी हैं। आयुर्वेद के अनुसार,

यज्ञोपवीत धारण करने से इंसान की उम्र लंबी, बुद्धि तेज, और मन स्थिर होता है। जनेऊ धारण करने से व्यक्ति बलवान, यशस्वी, वीर और पराक्रमी होता है। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है। आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है

ग्रहण काल में भोजन ग्रहण न करने का वैज्ञानिक आधार क्या हैं-

प्रत्येक वर्ष लगभग कम से कम पांच ग्रहण होते हैं। सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को लेकर अनेक प्रकार के नियम और मान्यताएं हैं। इस अवधि काल में यह माना जाता है कि इस समय भोजन नहीं करना चाहिए, शयन नहीं करना चाहिए और साधना आदि विषयों में मन लगाना चाहिए। इस मान्यता का वैज्ञानिक आधार तलाशने पर हम यह पाते हैं कि ग्रहण के दौरान पारबैंगनी वायुमंडल में उत्सर्जित होती है जिससे भोजन विषैला होने की पूर्ण संभावना रहती है। ग्रहण काल की किरणों का आंख के रैटिना पर विनाशकारी असर पड़ता है इसलिए हिन्दू धर्म में इसे देखने की मनाही की गई है। ग्रहण के दौरान सूर्य या चन्द्र के प्रतिबिम्ब को जल में देखने से दु:ख की प्राप्ति होती है।

गाय को माता का स्वरुप मानने का वैज्ञानिक आधार क्या हैं-

भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से ही गाय को माता का स्थान दिया गया है। यह माना जाता है कि गाय का मुख भाग अपवित्र है लेकिन गाय के पीठ के बाद का भाग परम पवित्र हैं। यही कारण है कि गोमूत्र, दुघ व गोबर को पवित्र और शुद्ध माना जाता है। गाय के दूध, गोबर और गोमूत्र से अनेक असाध्य रोगों के चिकित्सा कार्यों में औषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है। आज इसकी पुष्टि वैज्ञानिकों ने भी कर दी हैं कि गाय के दूध में प्रोटीन एवं अनेक विटामिन्स अन्य दूध की अपेक्षा अधिक है। इस दूध में यकृत एवं प्लीहा के रोगों को दूर करने की क्षमता सामान्य से अधिक रहती है। इसी प्रकार हर शुभ कार्य का प्रारंभ गोबर लीपने से प्रारंभ होता है। वैज्ञानिकों ने माना गोबर में कीटाणुनाशक फास्फोरस तत्वों की अधिकता है। इसी क्रम में गाय से प्राप्त पांचों सार अर्थात दूध, धृत, दही, गौमूत्र और गोबर के समिश्रण पंचद्रव्य के रूप में अमृत रूप में सनातन मान्यता प्रचलित है।

ब्रह्म मुहूर्त का वैज्ञानिक आधार क्या हैं

रात्रि का आखिरी प्रहर ब्रह्म मुहूर्त कहलाता हैं। सरल शब्दों में यह सूर्योदय से ठीक पूर्व का समय होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह सबसे अच्छा मुहूर्त माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। ब्रह्म मुहूर्त के विषय में एक वैज्ञानिक सोच जुड़ी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस समय में वायुमंडल में प्रदूषण सबसे कम होता हैं। शोध यह भी कहता है कि इस समय में वायु में ऑक्सीजन की मात्रा सबसे ज्यादा होती हैं। स्वास्थ्य के पक्ष से यह वायु सबसे अधिक उत्तम मानी गई है। यही वजह है कि इस समय में उठकर घूमने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है।

पीपल के वृक्ष की पूजा का वैज्ञानिक आधार क्या हैं

ज्योतिष शास्त्र और हिन्दू धर्म में पीपल के पेड़ की पूजा का विधि-विधान है। यह माना जाता है कि पीपल के पेड़ में ब्रह्म देवता निवास करते हैं। पीपल के पेड़ के बारे में वैज्ञानिक अनुसंधान यह कहते हैं कि यह एकमात्र वृक्ष है जो दिन और रात दोनों समय में आक्सीजन का विसर्जन करता है। यह वातावरण/वायुमंडल को शुद्ध करने का कार्य करता हैं। इसके विपरीत अन्य सभी वृक्ष कार्बनडाआक्साइड का विसर्जन करते हैं। आयुर्वेदिक शास्त्र में भी पीपल के पेड़ के पत्ते, छाल एवं फल सभी रोगनाशक है। पीपल के वृक्ष का प्रत्येक भाग किसी न किसी रुप में प्रयोग होता हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पीपल के पेड़ की पूजा उपासना से शनि जनित दोषों का शमन होता है। लाल किताब के अनेक टोटकों में भी पीपल के पेड़ का प्रयोग किया जाता है।

तुलसी के पौधों को विशेष स्थान का वैज्ञानिक आधार क्या हैं

भारतीय संस्कृति में तुलसी के पौधे का बहुत महत्व है, और इस पौधे को बहुत पवित्र माना जाता है। यही कारण है कि इसे घर के आंगन में स्थान दिया गया हैं। इसके पौराणिक महत्व और औषधिय महत्व को देखते हुए इससे देवी का दर्जा दिया गया है। देवताओं को अर्पित भोग प्रसाद बिना तुलसी पत्र के नहीं चढ़ता है। मरणासन्न प्राणी के अंतिम समय में गंगाजल के साथ तुलसी पत्र दिया जाता है। तुलसी का पौधा एक दिव्य औषधि पौधा है। इसमें असाध्य एवं संक्रामक बीमारियों को रोकने की क्षमता है। तुलसी के मंजरियों की विशेष खुशबू से विषधर सांप नहीं आते हैं। आखिर इस पौधे को इतना महत्व क्यों दिया गया है जब इसका विश्लेषण वैज्ञानिकों ने किया तो पाया कि तुलसी का पौधा अपने आयुर्वेदिक गुणों के कारण अपना विशेष महत्व रखता है। प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते हैं। मां तुलसी के समीप आसन लगा कर यदि कुछ समय हेतु प्रतिदिन बैठा जाये तो श्वांस के रोग अस्थमा आदि से जल्दी छुटकारा मिलता है। घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है। इसका उपयोग सर्दी-जुकाम, खॉसी, दंत रोग और श्वास सम्बंधी रोग के लिए बहुत ही फायदेमंद माना जाता है।

हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का वैज्ञानिक आधार क्या हैं

हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का विधि-विधान हैं। यह माना जाता है कि चंचल मन को एकाग्रचित्त रखने के लिए साक्षात साकार रुप की धारणा को महत्व दिया गया हैं। उन्नति, ज्ञान और सदमार्ग तक पहुंचने के लिए मन सुस्थिर होना

आवश्यक हैं। ईश्वर की प्राप्ति के लिए ईश्वर के साकार रुप की पूजा-उपासना को सबसे सहज मार्ग कहा गया हैं। जैसे- माता के चित्र को देखकर वात्सल्य की भावना स्वत: ही जागृत हो जाती है। यह माना जाता है कि मूर्ति पूजा तो बीज

हैं, जब बीज से अंकुरण हो जाता है तो बीज स्वत: ही मिट जाता हैं। बीज जब मिटता है तभी तो अंकुरण होगा, मूर्ति में नारायण को देखने के बाद मूर्ति का अस्तित्व नहीं रहता हैं। नारायण की प्राप्ति के लिए मूर्ति पूजन मार्ग (साधन) का

कार्य करती है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि जैसे किसी घर की छत पर जाने के लिए सीढ़ी सहज मार्ग है उसी प्रकार, मूर्ति की उपासना ईश्वरीय शक्ति तक पहुंचने का सहज मार्ग हैं।

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री

8178677715, 9811598848

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव पिछले 15 वर्षों से सटीक ज्योतिषीय फलादेश और घटना काल निर्धारण करने में महारत रखती है. कई प्रसिद्ध वेबसाईटस के लिए रेखा ज्योतिष परामर्श कार्य कर चुकी हैं। आचार्या रेखा एक बेहतरीन लेखिका भी हैं। इनके लिखे लेख कई बड़ी वेबसाईट, ई पत्रिकाओं और विश्व की सबसे चर्चित ज्योतिषीय पत्रिकाओं में शोधारित लेख एवं भविष्यकथन के कॉलम नियमित रुप से प्रकाशित होते रहते हैं। जीवन की स्थिति, आय, करियर, नौकरी, प्रेम जीवन, वैवाहिक जीवन, व्यापार, विदेशी यात्रा, ऋण और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, धन, बच्चे, शिक्षा, विवाह, कानूनी विवाद, धार्मिक मान्यताओं और सर्जरी सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं को फलादेश के माध्यम से हल करने में विशेषज्ञता रखती हैं।

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