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अनमोल वचन

अनमोल वचन

आजकल होली में तो एक-दूसरे पर कीचड फेंका ही जाता है, आफिसों के कमरे हों या घर के कमरे हों, यहां पर भी कीचड का खेल भरपूर है। बडे अधिकारी और छोटे कर्मचारी इस मामले में दोनों में भरपूर भाईचारा है। काम छोटा ही सही, परन्तु उसकी कीमत बडी होती है। इस मामले में जो भुक्तभोगी है, उनकी खबरें आये दिन सुर्खियों में रहती हैं। घरों के सम्बन्धों की मर्यादा जब तब संकट में पडती रहती है। यह भी कहा जा सकता है कि मर्यादाएं समाप्त हो गई हैं। सगे-सम्बन्धी बस शब्दों तक सिमट गये हैं। यथार्थ में सगापन कहीं नजर नहीं आता। आफिस के कमरों की कीचड तो बाहर भी दिखने लगती है, परन्तु घरों के कमरों की कीचड तो घरों को ही बदबूदार बनाये रहती है। जो भुगतते हैं, उनका बस यही रोना रहता है- अपना दुखडा किसे सुनाऊं, किससे कहूं। इस कीचड में सने हुए बेहाल लोगों की सिसकियां यही कहती हैं कि मन का मैल सब तरफ से रिसरिसकर जीवन के पर्यावरण को बुरी तरह प्रदूषित कर रहा है। सचमुच जल में जहर घुल चुका है और हवाओं में दुर्गन्ध, कहां जायें, किससे कहें? मन की पीडा मन में ही मसोसनी पडती है।

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