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अनमोल वचन

अनमोल वचन

प्रेम अनगिनत रंगों में रंगे सौन्दर्य का प्रतीक है, जो कई रंगों में दिखकर भी एक ही है। कोई जब इसके एक रंग को पकडकर इसी को प्रेम मान बैठता है, तो यह प्रेम के प्रति नाइंसाफी है। नारी का प्रेम बहुआयामी होता है। जो नारी अपने प्रियतम के संग प्रेयसी भाव से विचरती है, वही अपनी सन्तानों को वात्सल्य के रस में सराबोर भी कर देती है, वही माता-पिता एवं दुखी पीडितों के प्रति अत्यंत करूणा भाव से सेवा के रूप में समर्पित हो जाती है। इस प्रकार अलग-अलग रूपों में अपने प्रेम को अलग-अलग ढंग से अभिव्यक्त करती है। नारी के प्रेम की यें सारी अभिव्यक्तियां उसके हृदय में प्रवाहित होती हैं। प्रेम केवल हृदय से अभिव्यक्त किया जा सकता है। प्रेम को सौंदर्य मानकर आंखों में बसा लेना, संगीत समझकर कानों में समा लेना सम्भव नही। ऐसा करना तो प्रेम की पावनता को मलिन करना है और उसकी अनन्तता को सीमित एवं क्षुद्र करता है। इसी कारण पवित्र कहे जाने वाले प्रेम को मोह और वासना मानकर इन्द्रियों का विषय मान लिया जाता है। इस प्रकार प्रेम बादल की उन बूंदों के समान होता है, जो बादलों के आंचल में तो पवित्र होती है, परन्तु धरती में समाते ही मिट्टी में मिलकर मैली हो जाती है।

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