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अनमोल वचन

अनमोल वचन

आदमी यदि निर्दयी है तो समझना कि वह धर्म के नाम पर कुछ भी करता है, परन्तु धार्मिक इन्सान नहीं है। वेदों का सार यही है कि मनुष्य को मनुष्य बनना चाहिए और अपनी आत्मा के विपरीत व्यवहार किसी से भी नहीं करना चाहिए। सबसे बडा धर्म यह है कि मनुष्य में दयालुता का गुण होना चाहिए। दूसरे को दुखी देखे तो हृदय में दर्द उठना चाहिए। महर्षि पंतजलि ने कहा कि जो लोग भक्ति करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने चित्त को कोमल बनाना चाहिए और चित्त को कमल करने का रास्ता क्या है? मैत्री, करूणा (दया) सबके साथ मित्रता का व्यवहार करें अर्थात अपने व्यवहार में शत्रुता या बैर भाव न रखें। जिसमें शत्रुता और बैर नहीं, उसका चित्त कोमल होगा। चित्त की कोमलता का दूसरा लक्षण है करूणा। व्यक्ति को दयालु होना चाहिए, दयालु भी कैसा? किसी का भी दर्द देखा, किसी को भी तडफते देखा, किसी को भी व्याकुल देखा तो हृदय में पीडा होने लग जाये और जो बन सके, उसे दूर करने का उपाय करे।

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