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अनमोल वचन

अनमोल वचन

हममें से अधिकांश मुगालते और खुशफहमी में रहने के आदि हो चुके हैं। वें ऐसे व्यवहार कर रहे हैं, मानो वें कोई विशिष्ट हैं और उन्हें सदियों तक जीवित रहना है। अपने बारे में जानना अपनी रचना और अपने नाशवान होने के बारे में विश्वास करना है। यह विश्वास उसके आचरण को बदल देता है और उस परम शक्ति के निकट ले जाता है, जिसने उसे रचा है और जीवन दिया है। वास्तव में अपने आप में अपने जैसा कुछ भी नहीं है। यदि अपने जैसा कुछ भी शेष रहने वाला नहीं है तो कैसा अहंकार। मनुष्य का अहंकार ही उसकी अधिकांश समस्याओं का मूल है और उसे ईश्वर से दूर ले जाने वाला है। ईश्वर से दूर रहना जीवन के लक्ष्य से भटकना है। पंचतत्वों से बने तन के अन्दर की चेतना अथवा आत्मा कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, परमात्मा का ही अंश है। मानव योनि उस बिगडी हुई आत्मा का परम आत्मा से मेल का अवसर है, ताकि वह आवागमन के चक्र से मुक्त हो सके। मैं के सच को धारण करके ही मैं से मुक्त हुआ जा सकता है और परमात्मा की अनुभूति की जा सकती है। उस अदृश्य शक्ति की अनुभूति के बाद व्यक्ति के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं और वह परमानन्द की स्थिति को प्राप्त हो जाता है।

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